Skip to main content

आदि पर्व महाभारत -

आदि पर्व महाभारत - Krishnakosh

आदि पर्व की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है- जैसा कि नाम से ही विदित होता है, यह महाभारत जैसे विशाल ग्रन्थ की मूल प्रस्तावना है। प्रारम्भ में महाभारत के पर्वों और उनके विषयों का संक्षिप्त संग्रह है। कथा-प्रवेश के बाद च्यवन का जन्म, पुलोमा दानव का भस्म होना, जनमेजय के सर्पसत्र की सूचना, नागों का वंश, कद्रू और विनता की कथा, देवों-दानवों द्वारा समुद्र मंथनपरीक्षित का आख्यान, सर्पसत्र, राजा उपरिचर का वृत्तान्त, व्यासआदि की उत्पत्ति, दुष्यन्त-शकुन्तला की कथा, पुरूरवानहुष और ययाति के चरित्र का वर्णन, भीष्म का जन्म और कौरवों-पाण्डवों की उत्पत्ति, कर्ण-द्रोण आदि का वृत्तान्त, द्रुपदकी कथा, लाक्षागृह का वृत्तान्त, हिडिम्ब का वध और हिडिम्बा का विवाह, बकासुर का वध, धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति, द्रौपदी-स्वयंवर और विवाह, पाण्डव का हस्तिनापुर में आगमन, सुन्द-उपसुन्द की कथा, नियम भंग के कारण अर्जुन का वनवास, सुभद्राहरणऔर विवाह, खाण्डव-दहन और मयासुर रक्षण की कथा वर्णित है।

आदिपर्व- वंश-परिचय

शांतनु और भीष्म
Blockquote-open.gif

विचित्रवीर्य से अंबिका को धृतराष्ट्र तथा अंबालिका को पांडु नामक पुत्र पैदा हुए। विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया, क्योंकि धृतराष्ट्र जन्मांध थे। भीष्म ने अंबिका की एक दासी के पुत्र विदुर का लालन-पालन भी राजकुमारों की तरह किया था। यही विदुर धर्म-नीति के पंडित हुए।

Blockquote-close.gif

प्राचीन भारत में ययाति नाम के प्रतापी राजा राज करते थे, जिनकी राजधानी खांडवप्रस्थथी। इसी स्थान पर आगे चलकर इंद्रप्रस्थ भी बसा था। ययाति की दो रानियाँ थीं-

देवयानी से दो पुत्र हुए- यदु और तुर्वसु। यदु के नाम से आगे चलकर 'यदु वंश' चला जिसमें श्रीकृष्ण भी पैदा हुए। शर्मिष्ठा के तीन पुत्र हुए, जिनमें सबसे छोटा पुरु बहुत पराक्रमी तथा पितृभक्त था। ययाति ने पुरु को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। पुरु के नाम से ही पुरु वंश की परंपरा चली। पुरु के वंश में ही आगे चलकर दुष्यंत हुए जिन्होंने शकुंतला से विवाह किया तथा उनके पुत्र 'भरत' के नाम पर ही हमारे देश का नाम 'भारत' पड़ा। भरत के वंश में 'हस्तिन' नाम के राजा हुए जिन्होंने अपनी नई राजधानी हस्तिनापुर में बसाई। हस्तिन के राजवंश में कुरु नाम के राजा हुए जिनके वंशज कौरव कहलाए। कुरु के नाम से ही कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ।

शांतनु

कौरव राजवंश में शांतनु नाम के प्रतापी राजा हुए। शांतनु ने भगवती गंगा से विवाह किया था। कहा जाता है कि एक-बार अष्ट-वसु नाम के आठ देवताओं से तंग आकर वसिष्ठ मुनिने उन्हें शाप दिया कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना होगा। परंतु आठों वसुओं की प्रार्थनापर, मुनि ने कहा कि सात वसुओं का तो जन्म लेते ही उद्धार हो जाएगा, पर सबसे उत्पाती वसु प्रभास को मृत्यु-लोक में बहुत दिन तक रहना होगा। इन्हीं अष्ट वसुओं को शाप से मुक्त कराने के लिए भगवती गंगा ने उनकी माँ बनना स्वीकार किया। शांतनु से विवाह करने पर गंगा को आठ पुत्र हुए। सात को तो गंगा ने पैदा होते ही अपनी धारा में बहा दिया। आठवें पुत्र को शांतनु ने नहीं बहाने दिया, तब गंगा इस पुत्र को अपने साथ स्वर्ग ले गई तथा इसका नाम देवव्रत रखा। देवव्रत ही आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक दिन गंगा तट पर शांतनु ने देखा कि एक बालक ने अपने बाणों से गंगा के प्रवाह को रोक रखा है तभी गंगा प्रकट हुई तथा शांतनु को बताया कि यह आपका पुत्र देवव्रत है। शांतनु ने इसी पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

भीष्म प्रतिज्ञा

एक बार शांतनु ने यमुना नदी के किनारे एक सुंदर धीवर कन्या सत्यवती को देखा तथा उससे विवाह करने की इच्छा प्रकट की। सत्यवती का पिता विवाह के लिए तैयार हो गया, पर उसने एक शर्त रखी कि उसकी कन्या का पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। शर्त को सुनकर राजा सोच में पड़ गए तथा दुखी रहने लगे। पिता के दुख को जानकर देवव्रत स्वयं धीवर के पास गए तथा कहा कि आपकी कन्या का पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। धीवर ने कहा कि मुझे आपकी बात पर पूरा भरोसा है, पर आपका पुत्र यदि राज्य का दावा करेगा तो मेरी कन्या के पुत्र का क्या होगा। इस पर देवव्रत ने प्रतिज्ञा की कि मैं आजन्म ब्रह्मचारी रहूँगा तथा आपकी कन्या का पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। देवव्रत की इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उन्हें भीष्म कहा जाता है। शांतनु का विवाह सत्यवती से हो गया तथा उन्हें दो पुत्र हुए-

शांतनु के बाद चित्रांगद ही गद्दी पर बैठे। चित्रांगद की मृत्यु के बाद विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे।

धृतराष्ट्र और पांडु

विचित्रवीर्य के विवाह योग्य होने पर, भीष्म को काशी नरेश की तीन कन्याओं अंबाअंबिका और अंबालिका के स्वयंवर का निमंत्रण मिला। भीष्म विचित्रवीर्य को साथ लेकर स्वयंवर में गए तथा तीनों राजकन्याओं को बलपूर्वक रथ में बैठाकर ले आए। अंबा ने भीष्म से निवेदन किया कि मैं मन से शाल्वराज को अपना पति मान चुकी हूँ, इसीलिए भीष्म ने उसे मुक्त कर दिया और अंबिका एवं अंबालिका से विचित्रवीर्य का विवाह हो गया।

अंबा शाल्वराज के पास पहुँची, पर शाल्वराज ने उसे स्वीकार नहीं किया। दुखी अंबा का मन भीष्म से बदला लेने का वर प्राप्त किया। आगे चलकर यही अंबा शिखंडी के रूप में जन्मी तथा भीष्म की मृत्यु का कारण भी बनी।

विचित्रवीर्य से अंबिका को धृतराष्ट्र तथा अंबालिका को पांडु नामक पुत्र पैदा हुए। विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद पांडु को राजगद्दी पर बिठाया गया, क्योंकि धृतराष्ट्र जन्मांध थे। भीष्म ने अंबिका की एक दासी के पुत्र विदुर का लालन-पालन भी राजकुमारों की तरह किया था। यही विदुर धर्म-नीति के पंडित हुए।

धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ था। गांधारी धृतराष्ट्र के अंधा होने के कारण अपनी आँखों पर भी पट्टी बाँधे रहती थी। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र एक पुत्री हुई। पुत्रों में सबसे बड़ा दुर्योधन तथा पुत्री का नाम था दुःशला, जिसका विवाह जयद्रथ से हुआ था। धृतराष्ट्र की दूसरी पत्नी [1] से युयुत्सु नाम का पुत्र पैदा हुआ था।

Blockquote-open.gif

शस्त्र-शिक्षा में पांडव कौरवों से सदा आगे रहते थे। एक दिन जब वे शस्त्र-विद्या का अभ्यास कर रहे थे, उनकी गेंद एक कुएँ में गिर गई। युधिष्ठिर ने जब कुएँ में झाँका तो उनकी अँगूठी भी कुएँ में गिर गई। तभी उन्हें एक तेजस्वी ब्राह्मण उधर आता दिखाई दिया। ब्राह्मण ने राजकुमारों की चिंता का कारण पूछा तथा एक सींक मंत्र पढ़कर कुएँ में छोड़ी। वह सींक गेंद पर तीर की तरह चुभ गई। इसी तरह उसने कई और सींके कुएँ में फेंकी जो एक-दूसरे के ऊपरी सिरों पर चिपकती चली गईं। जब सींक इतनी लंबी हो गई कि कुएँ के सिरे तक आ गई तो उन्होंने सींक को खींच लिया तथा गेंद बाहर आ गई। राजकुमारों को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने युधिष्ठिर की अँगूठी भी निकालने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने धनुष से बाण चलाकर अँगूठी को बाण की नोंक में फँसाकर बाहर निकाल दिया। नाम पूछने पर पता चला कि वे आचार्य द्रोण थे।

Blockquote-close.gif

पांडु का विवाह शूरसेन की कन्या 'पृथा' से हुआ, उसी को कुंती के नाम से भी जाना जाता था, जो श्रीकृष्ण की बुआ लगती थी। कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने उसे एक ऐसा मंत्र बताया था जिससे वह किसी देवता का आह्वान कर सकती थी। कौमार्य में ही कुंती ने मंत्र की परीक्षा लेने के लिए सूर्य का आह्वान किया तथा सूर्य की कृपा से उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई। लोक-लाज के भय से कुंती ने उसे गंगा में बहा दिया। कौरवों के सारथी अधिरथ ने उसका पालन-पोषण किया। कर्ण के नाम से प्रसिद्ध यह बालक सारथी द्वारा पाला गया था, इसीलिए सूत-पुत्र कहलाया। कुंती से पांडु के तीन पुत्र हुए -

उनकी दूसरी पत्नी माद्री से उन्हें नकुल तथा सहदेव प्राप्त हुए। इस प्रकार धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव तथा पांडु के पुत्र पांडव कहलाए। वन विहार करते समय पांडु की मृत्यु हो गई तथा उनकी रानी माद्री उन्हीं की चिता के साथ सती हो गई। कुंती ने ही पाँचों पुत्रों का पालन-पोषण किया।

कौरव-पांडव

कौरवों तथा पांडवों की शिक्षा कृपाचार्य की देख-रेख में होने लगी। दुर्योधन धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र होने के कारण अपने आपको ही राज्य का उत्तराधिकारी समझता था। वह पांडवों से ईर्ष्या रखता था तथा भीम से विशेष रूप से जलता था। भीम भी कौरवों को खूब सताता था। दुर्योधन ने भीम को मारने की योजना बनाई। वह जल-क्रीड़ा के बहाने भीम को गंगातट पर ले गया। उसने भीम के भोजन में विष मिलवा दिया तथा जब वे अचेत होकर ज़मीन पर गिर पड़े तो लताओं से बाँधकर गंगा में बहा दिया। भीम के घर न पहुँचने पर सभी को बहुत चिंता हुई। गंगा में बहते समय भीम को विषैले नागों ने डस लिया तथा नागों के विष से भोजन के विष का प्रभाव समाप्त हो गया। वे जल से बाहर आ गए। पांडव भीम को जीवित पाकर बहुत प्रसन्न हुए और दुर्योधन तथा उसके भाइयों में फिर से चिंता व्याप्त हो गई।

कौरवों और पांडवों की शस्त्र-शिक्षा

शस्त्र-शिक्षा में पांडव कौरवों से सदा आगे रहते थे। एक दिन जब बे शस्त्र-विद्या का अभ्यास कर रहे थे, उनकी गेंद एक कुएँ में गिर गई। युधिष्ठिर ने जब कुएँ में झाँका तो उनकी अँगूठी भी कुएँ में गिर गई। तभी उन्हें एक तेजस्वी ब्राह्मण उधर आता दिखाई दिया। ब्राह्मण ने राजकुमारों की चिंता का कारण पूछा तथा एक सींक मंत्र पढ़कर कुएँ में छोड़ी। वह सींक गेंद पर तीर की तरह चुभ गई। इसी तरह उसने कई और सींके कुएँ में फेंकी जो एक-दूसरे के ऊपरी सिरों पर चिपकती चली गईं। जब सींक इतनी लंबी हो गई कि कुएँ के सिरे तक आ गई तो उन्होंने सींक को खींच लिया तथा गेंद बाहर आ गई। राजकुमारों को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने युधिष्ठिर की अँगूठी भी निकालने की प्रार्थना की। ब्राह्मण ने धनुष से बाण चलाकर अँगूठी को बाण की नोक में फँसाकर बाहर निकाल दिया। नाम पूछने पर पता चला कि वे आचार्य द्रोण थे। उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ था तथा उनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा था। पांचाल के राजा द्रुपद आचार्य द्रोण के सहपाठी थे तथा दोनों में गहरी मित्रता थी। द्रुपद ने उनसे वायदा किया था कि राजा बनने पर वे द्रोण को आधा राज्य दे देंगे, पर राजा बनने पर उन्होंने न केवल अपना वायदा भुला दिया, अपितु द्रोण का अपमान भी किया। तभी से द्रोण के मन में द्रुपद से बदला लेने की भावना घर कर गई थी।

द्रोणाचार्य की शस्त्र-विद्या से प्रभावित होकर भीष्म ने द्रोणाचार्य को राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा के लिए रख लिया। इनकी शिक्षा से सभी राजकुमार धनुर्विद्या में निपुण हो गए, पर अर्जुन सबसे दक्ष थे तथा इसीलिए द्रोण को सबसे अधिक प्रिय भी थे।

लक्ष्य-भेद की परीक्षा

एक दिन गुरु द्रोण ने सभी शिष्यों की परीक्षा ली। उन्होंने एक पेड़ की ऊँची डाल पर लकड़ी की एक चिड़िया रख दी तथा कहा कि चिड़िया की आँख में लक्ष्य-भेद करना है। सबसे पहले युधिष्ठिर की बारी आई। द्रोण ने उनसे पूछा कि तुम इस समय क्या देख रहे हो। युधिष्ठिर ने बताया कि मैं आपको तथा पेड़ की डाल पर रखी चिड़िया को देख रहा हूँ। द्रोण ने उनसे कहा कि तुमसे लक्ष्य-भेद न होगा। एक-दूसरे करके सभी राजकुमारों ने लगभग ऐसा ही उत्तर दिया तथा द्रोण ने सभी को हटा दिया। अंत में अर्जुन की बारी आई। जब वही प्रश्न अर्जुन से किया गया तो उन्होंने कहा कि मुझे केवल चिड़िया की आँख ही दिखाई दे रही है। यह कहकर अर्जुन ने तीर चलाया, जो चिड़िया की आँख में लगा। उस दिन से अर्जुन द्रोणाचार्य के और भी प्रिय हो गए।

गुरु-भक्त एकलव्य

एक दिन एकलव्य नाम का भील बालक गुरु द्रोण के पास धनुर्विद्या सीखने की इच्छा से लाया। गुरु द्रोण ने उसे बताया कि वे केवल राजकुमारों को ही शिक्षा देते हैं। बालक चला गया, पर उसने गुरु द्रोण की मूर्ति बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास किया तथा धनुर्विद्या में निपुण हो गया। एक दिन सभी राजकुमार जंगल में खेलने गए। एक कुत्ता भी उनके आगे-आगे चल रहा था। कुछ आहट पाकर वह भौंकने लगा। एकलव्य ने एक-एक करके कई तीर छोड़े जो कुत्ते के मुँह में जा घुसे कुत्ते का भौंकना बंद हो गया, पर उसे कहीं चोट नहीं आई। राजकुमारों को बहुत आश्चर्य हुआ। जब उन्होंने एकलव्य से पूछा कि उसे धनुर्विद्या किसने सिखाई है, तो उसने द्रोण की मूर्ति की ओर इशारा किया तथा कहा-आचार्य द्रोण ने। राजधानी लौटकर राजकुमारों ने एकलव्य की धनुर्विद्या का समाचार गुरु द्रोण को सुनाया तथा कहा कि एकलव्य ने धनुर्विद्या में हमसे भी अधिक कुशलता प्राप्त कर ली है। गुरु द्रोण ने बताया कि एकलव्य को जो सिद्धि मिली है, वह उसकी गुरु-भक्ति तथा श्रद्धाका परिणाम है।

शस्त्र- संचालन का प्रदर्शन

एक दिन पितामह भीष्म ने गुरु द्रोण से सलाह करके के शस्त्र-संचालन के प्रदर्शन की व्यवस्था की। निश्चित समय पर रंगस्थली दर्शकों से भर गई। भीष्मधृतराष्ट्रगांधारीकुंतीविदुर आदि सभी उपस्थित थे। सभी ने अपना-अपना कौशल दिखाया तथा सभी का मन मोह लिया। विदुर ने धृतराष्ट्र को प्रदर्शन का वृत्तांत सुनाया। भीम और दुर्योधन ने गदा-युद्ध का कौशल दिखाया। दोनों एक-दूसरे से ईर्ष्या रखते थे, अतः एक दूसरे पर वार करने लगे लगे, पर गुरु द्रोण ने संकेत पर अश्वत्थामा ने उन्हें अलग-अलग कर दिया।

कर्ण की चुनौती

अर्जुन की धनुर्विद्या की प्रशंसा सभी कर रहे थे कि इसी समय कर्ण आगे आया तथा अपनी कला दिखाने की इच्छा व्यक्त करते हुए बोला कि जो कुछ अर्जुन ने किया, वह मेरे लिए अत्यंत साधारण-सी बात है। कर्ण ने कहा कि मैं अर्जुन से द्वंद्व-युद्ध करना चाहता हूँ। पर कृपाचार्य ने उसे सूतपुत्र कहकर द्वंद्व-युद्ध की बात काट दी, क्योंकि राजकुमार से द्वंद्व-युद्ध करने का अधिकारी राजकुमार ही होता है। इस पर दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया तथा सभाभवन में ही उसका राजतिलक कर दिया। अर्जुन ने कर्ण से कहा कि कर्ण तुम वीर हो, पर तुम यह मत समझो कि वीरता का वरदान केवल तुम्हें ही मिला है। संध्या हो चली थी, इसीलिए पितामह भीष्म ने प्रदर्शन को बंद करने का आदेश दे दिया। अर्जुन की गर्वोक्ति कर्ण के मन में चोट बनकर रह गई।

राजा द्रुपद से प्रतिशोध

एक दिन द्रोणाचार्य ने सभी राजकुमारों को बुलाकर शस्त्र-विद्या की शिक्षा के बदले गुरुदक्षिणा माँगी। उन्होंने द्रुपद को पकड़कर अपने सामने लाने की आज्ञा दी। गुरु की आज्ञा मानकर पांडवों ने पांचाल राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा द्रुपद को पकड़कर द्रोण के सामने उपस्थित किया। इस प्रकार द्रोण ने द्रुपद से बदला ले लिया। बाद में द्रुपद ने भी अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया तथा उन्हें धृष्टद्युम्न नामक पुत्र पैदा हुआ जिसने महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य का वध किया।

लाक्षागृह-दाह

दुर्योधन दिन-रात इसी चिंता में रहता कि किसी प्रकार पांडवों का नाश करके हस्तिनापुरपर राज्य कर सके। कौरवों-पांडवों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे तथा इसीलिए सिंहासन के उत्तराधिकारी समझे जाते थे। पर दुर्योधन सोचता था कि उसके पिता ज्येष्ठ होने पर भी जन्मांध होने के कारण गद्दी न पा सके, तो इससे उत्तराधिकारी का नियम तो नहीं बदल जाता। धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र होने के कारण मैं ही गद्दी का अधिकारी हूँ। शकुनिकर्णदु:शासन, आदि दुर्योधन के साथ थे। दुर्योधन ने पांडवों की बुराई करके धृतराष्ट्र को भी अपने पक्ष में कर लिया तथा पिता से पांडवों को वरणावर्त के मेले में भेजने को कहा। दुर्योधन एक योजना बनाकर पांडवों का नाश करना चाहता था। धृतराष्ट्र की आज्ञा से पांडव वरणावर्त चले गए। उनके जाते समय विदुर ने युधिष्ठिर को सावधान कर दिया तथा अगले संदेश की प्रतीक्षा करने को कहा।

Blockquote-open.gif

एक दिन अर्जुन राजभवन के द्वार पर बैठे थे, तभी एक ब्राह्मण रोता हुआ आया और उसने बताया कि चोर उसकी गाएँ चुरा ले गए हैं। अर्जुन उस समय निरस्त्र थे। उनके अस्त्र घर में थे, जहाँ युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ थे। अर्जुन धर्म-संकट में पड़ गए। यदि हथियार लेने घर में जाते हैं, तो बारह वर्ष का वनवास होगा और यदि गायों को नहीं छुड़ाते तो ब्राह्मण से शापमिलेगा। अंत में वे सिर झुकाकर घर में गए तथा अस्त्र ले आए। उन्होंने ब्राह्मण की गायें छुड़ाकर ब्राह्मण को दे दी। अर्जुन ने युधिष्ठिर से बारह वर्ष के वनवास की आज्ञा माँगी। युधिष्ठिर ने बहुत समझाया, पर अर्जुन, माता कुंती तथा भाइयों से मिलकर बारह वर्ष के वनवास के लिए निकल पड़े।

Blockquote-close.gif

दुर्योधन ने पुरोचन नाम के एक मंत्री से मिलकर वरणावर्त में लाख के एक महल में पांडवों को जलाकर मार डालने की योजना बना ली थी। लाख का वह महल ऐसा बनवाया गया था जो आग के स्पर्श से ही पूरी तरह जल उठे तथा पांडव जल मरें। जैसे ही पांडव वरणावर्त में बने लाख महल में जाने को तैयार हुए विदुर ने उन्हें एक संदेश भेजकर दुर्योधन की सारी योजना से सावधान करा दिया। एक कारीगर ने महल से बाहर निकलने के लिए सुरंग बना दी। पांडव महल के भीतर नहीं, इसी सुरंग में सोया करते थे, जिससे कि महल में आग लगने पर जल्दी ही बाहर निकल सकें। कृष्ण चतुर्दशी के दिन युधिष्ठिर को पुरोचन के रंग-ढंग से अहसास हो गया कि महल में आज रात को ही आग लगाई जाएगी। युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को सचेत कर दिया। पांडवों ने उस दिन यज्ञ किया था, जिसमें नगरवासियों के साथ एक भीलनी ने भी अपने पाँच पुत्रों के साथ भोजन किया था। भोजन के बाद वह भीलनी महल में ही सो गई। पुरोचन महल के बाहरी कमरे में सो रहा था। भीम ने रात को महल में आग लगा दी तथा माता कुंती को लेकर सुरंग से बाहर आ गए। पुरेचन तथा अपने पुत्रों के साथ भीलनी जल मरी है। हस्तिनापुर में शोक छा गया, पर विदुर को विश्वास था कि पांडव अवश्य ही बच निकले होंगे। लाक्षागृह से निकलकर पांडव दुर्गम वन पार करते हुए गंगा तट पहुँचे, जहाँ उन्हें विदुर का भेजा एक आदमी नाव के साथ मिला था पांडव उसी नाव में गंगा पार हो गए।

हिडिंब का वध

गंगा पार करके पांडव दक्षिण की ओर बढ़ते रहे तथा घने जंगल में पहुँच गए। थकान और भूख-प्यास से सभी का बुरा हाल था। भीम सबको एक वट-वृक्ष के नीचे बैठाकर पानी की तलाश में इधर-उधर देखने लगे। पेड़ पर चढ़कर उन्होंने पास ही कुछ पक्षी देखे तथा समझ लिया कि अवश्य ही उधर पानी है। वे उसी तरफ गए तथा एक जलाशय के किनारे पहुँच गए, जहाँ उन्होंने अपनी प्यास बुझाई तथा स्नान किया। वे माता और भाइयों के लिए भी पानी लाए। थकान होने के कारण वे सब सो गए थे। उस जलाशय के पास हिडिंब नाम का एक राक्षस रहता था। उसकी बहन हिडिंबा का भी उसी के साथ रहती थी। जैसे ही राक्षस को मानव-गंध मिली, उसने अपनी बहन को उन्हें मारकर मांस लाने को भेजा हिडिंबा भीमको देखकर मोहित हो गई। उसने सुंदर युवती का रूप धारण कर लिया तथा बोली कि मेरे भाई ने मुझे तुम्हें मारने के लिए भेजा था, पर मैं तुमसे विवाह करना चाहती हूँ। सोए हुए लोगों को जगाओ, जिससे कि मैं उन्हें अपनी माया से सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दूँ। यदि मेरा भाई यहाँ आ गया, तो वह सबको मार डालेगा। वह बड़ा क्रूर तथा बलवान है। भीम ने कहा कि मुझे तुम्हारे भाई से कोई भय नहीं है। तभी वहाँ हिडिंब आ गया। जब उसने अपनी बहन को सुंदर युवती के रूप में भीम से बात करते देखा तो अत्यंत क्रुद्ध हो गया। पहले वह हिडिंबा को ही मारने दौड़ा। भीम ने उसे बीच में ही पकड़ लिया। दोनों में भयंकर युद्ध होने लगा। शोर सुनकर पांडव तथा माता कुंती जाग गईं। तभी भीम ने हिडिंब को पटक दिया, तथा उसके प्राण निकल गए। माता कुंती ने युधिष्ठिर की सलाह पर भीम को हिडिंबा से विवाह करने की अनुमति दे दी। समय पर उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ। जिसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह बहुत पराक्रमी योद्धा हुआ। जब भीम अपनी माता और भाइयों के साथ उस वन को छोड़कर आगे जाने की तैयारी करने लगे तो घटोत्कच ने भीम से कहा कि, 'पिताजी जब भी ज़रूरत हो, मुझे याद कीजिएगा। मैं आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा।'

बकासुर-संहार

वन-मार्ग पर चलते-चलते एक दिन पांडवों की भेंट महर्षि व्यास से हुई। महर्षि व्यास ने पांडवों को ढाँढ़स बँधाया तथा उन्हीं की सलाह पर पांडव ब्रह्मचारियों का वेश धारण कर एकचक्रा नामक नगरी में एक ब्राह्मण के घर रहने लगे। पाँचों भाई भिक्षा माँगकर लाते तथा उसी को बाँटकर अपना पेट भरते। एक दिन भीम घर पर रह गए। तभी कुंती ने अपने आश्रयदाता ब्राह्मण के घर रोने की आवाज़ सुनी। पूछने पर पता चला कि बक नाम का एक राक्षस नगर के पास ही गुफ़ा में रहता है, जो लोगों को जहाँ भी देखता, मारकर खा जाता था। नगरवासियों ने उससे तंग आकर एक समझौता कर लिया कि हर सप्ताह उसकी गुफ़ा में गाड़ी भरकर मांस, मदिरा, पकवान आदि भेज दिया जाएगा तथा गाड़ीवान भी उसी खुराक में शामिल होगा। उस दिन गाड़ीवान के रूप में उस ब्राह्मण को जाना था। वहाँ पहुँचकर वह कभी ज़िंदा वापस नहीं आ सकेगा, इसीलिए घर के सभी लोग रो रहे हैं। कुंती ने ब्राह्मण को धीरज बँधाया तथा कहा कि उसकी जगह मेरा पुत्र भीम चला जाएगा तथा बकासुर उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा। भीम भोजन तथा पकवान से भरी गाड़ी लेकर राक्षस की गुफ़ा तक पहुँचा तथा उसने उससे अपनी पेट-पूजा शुरू कर दी। बकासुर ने गुफ़ा से देखा कि एक विशाल शरीर वाला मनुष्य उसके भोजन को खा रहा है। वह भीम से भिड़ गया। भीम ने उसे लात-घूँसे मार-मारकर जान से मार डाला तथा उसकी लाश को नगर-द्वार तक ले आए। नगरवासियों की प्रसन्नता की सीमा न रही।

द्रौपदी-स्वयंवर

एकचक्रा नगरी में रहते हुए पांडवों ने पांचाल देश के राजा यज्ञसेन [2] की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर का समाचार सुना। तभी वहाँ व्यास भी आ गए। उनकी सलाह माता कुंती को साथ लेकर पांडव स्वयंवर देखने चल पड़े। रास्ते में पांडवों को धौम्य ऋषि मिले। पांडवों ने उन्हें अपना पुरोहित बना लिया। पांचाल राज्य पहुँचकर माता की सलाह से राजधानी के निकट एक कुम्हार के घर में टिक गए। स्वयंवर के दिन राजधानी को सजाया गया था। देश-देश के राजा उसमें भाग लेने आए थे। हस्तिनापुर से कर्णदुर्योधनदुशासन भी आए थे। स्वयंवर-भूमि के मध्य भाग में आकाश में एक मछली स्थिर थी। उसके नीचे एक चक्र बराबर घूम रहा था। नीचे पानी में मछली की परछाई को देखकर, जो उसकी आँख बेध सके, वही द्रौपदी से विवाह कर सकता था।

मत्स्य-भेदन

एक-एक करके अनेक राजाओं ने प्रयास किया, पर कोई भी मछली की आँख को नहीं वेध सका। कर्ण निशाना साधने चला, पर सूतपुत्र कहे जाने के कारण उसे बैठ जाना पड़ा। अंत में ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन ने एक तीर से मछली की आँख वेध दी। उपस्थित राजाओं की शंका पर अर्जुन ने दूसरी बार निशाना लगाकर मछली को ही नीचे गिरा दिया। द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला पहना दी। कुछ राजाओं ने ब्राह्मण वेशधारी से द्रौपदी को छीनने का प्रयास किया, पर जब भीम एक विशाल पेड़ उखाड़कर ले आए तो उनका साहस टूट गया। जब द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न को पता चला उसने अर्जुन का वरण किया, तो उसकी प्रसन्नता की सीमा न रही। घर पहुँचकर अर्जुन ने बाहर से ही माँ को बताया कि देखो कितनी अच्छी चीज़ लाया हूँ, तो भीतर से ही माता कुंती ने उत्तर दिया कि जो लाए हो, पाँचों भाई बाँट लो। माता कुंती ने जैसे ही बाहर आकर देखा तो असमंजस में पड़ गई, पर अर्जुन ने कहा कि माँ, तुम्हारा वचन मिथ्या नहीं होगा। तथा द्रौपदी से पाँचों भाइयों का विवाह होगा। जब द्रुपद ने सुना कि द्रौपदी का विवाह पाँचों पांडवों से होगा, तो बड़े चिंतित हुए। उसी समय महर्षि व्यास आ गए तथा उन्होंने द्रौपदी के पूर्व जन्म की कथा सुनाकर बताया कि उसे शंकर से पाँच पतियों का वरदान मिला है। इस प्रकार द्रौपदी से पाँचों पांडवों का विवाह हो गया।

पांडवों की हस्तिनापुर वापसी और इंदप्रस्थ की स्थापना

पांडवों के लाक्षागृह से बच निकलने तथा द्रौपदी के विवाह का समाचार चारों ओर फैल गया। धृतराष्ट्र इस समाचार से प्रसन्न नहीं थे, पर बाहरी प्रसन्नता प्रकट कर रहे थे। भीष्मऔर द्रोणाचार्य ने पांडवों को वापस बुलाने का मत प्रकट किया। यद्यपि दुर्योधन और कर्णने इसका विरोध किया, पर विदुर की सलाह पर धृतराष्ट्र ने उन्हीं को उन्हीं को पांडवों को लाने पांचाल भेजा। पांडवों की वापसी पर नगर-निवासियों ने बड़े हर्ष से उनका स्वागत किया। धृतराष्ट्र ने उन्हें आधा राज्य देकर सलाह दी कि कलह से बचने के लिए हस्तिनापुरछोड़कर खांडवप्रस्थ को अपनी राजधानी बना लें। धृतराष्ट्र की आज्ञा मानकर युधिष्ठिरसपरिवार खांडवप्रस्थ आ गए तथा वहाँ उन्होंने नई राजधानी बसाई जिसका नाम इंद्रप्रस्थरखा। तेरह वर्ष तक सुखपूर्वक उन्होंने राज्य किया।

अर्जुन का वनवास

एक दिन इंद्रप्रस्थ में नारद मुनि आए तथा द्रौपदी को सलाह दी कि वह पाँचों पांडवों के साथ रहने का नियम बना ले कि वह हर एक के साथ एक-एक मास रहेगी। जिससे भी यह नियम भंग हो, उसे घर छोड़कर बारह वर्ष का वनवास करना होगा। पांडव इस नियम का पालन करने लगे।

एक दिन अर्जुन राजभवन के द्वार पर बैठे थे, तभी एक ब्राह्मण रोता हुआ आया और उसने बताया कि चोर उसकी गाएँ चुरा ले गए हैं। अर्जुन उस समय निरस्त्र थे। उनके अस्त्र घर में थे, जहाँ युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ थे। अर्जुन धर्म-संकट में पड़ गए। यदि हथियार लेने घर में जाते हैं, तो बारह वर्ष का वनवास होगा और यदि गायों को नहीं छुड़ाते तो ब्राह्मण से शाप मिलेगा। अंत में वे सिर झुकाकर घर में गए तथा अस्त्र ले आए। उन्होंने ब्राह्मण की गायें छुड़ाकर ब्राह्मण को दे दी। अर्जुन ने युधिष्ठिर से बारह वर्ष के वनवास की आज्ञा माँगी। युधिष्ठिर ने बहुत समझाया, पर अर्जुन, माता कुंती तथा भाइयों से मिलकर बारह वर्ष के वनवास के लिए निकल पड़े।

नागकन्या उलूपी से अर्जुन का विवाह

देश-देश में घूमते हुए अर्जुन हरिद्वार पहुँचे। गंगा में स्नान करते समय नागराज कैरव्य की कन्या उलूपी अर्जुन पर मोहित हो गई। वह अर्जुन को पाताल लोक ले गई तथा उनसे विवाह किया। उलूपी ने अर्जुन को वरदान दिया कि आप जल में भी स्थल की तरह चल सकेंगे।

चित्रांगदा से अर्जुन का विवाह

नागलोक से ऊपर आकर अर्जुन अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुए मणिपुर पहुँचे, जहाँ की राजकन्या चित्रांगदा अत्यंत रूपवती थी। अर्जुन ने चित्रांगदा से विवाह किया। तीन वर्ष तक अर्जुन मणिपुर में चित्रांगदा के साथ रहे तथा उन्हें बभ्रुवाहन नाम का एक पुत्र भी प्राप्त हुआ।

सुभद्रा से अर्जुन का विवाह

मणिपुर से पंचतीर्थ होते हुए अर्जुन प्रभास तीर्थ पहुँचे। यह तीर्थ कृष्ण के राज्य में था। कृष्ण ने अर्जुन का स्वागत किया। यहाँ रहते हुए बलराम की बहन सुभद्रा के प्रति अर्जुन के मन में प्रेम पैदा हो गया। कृष्ण को जब इसका पता चला तो उन्होंने अर्जुन से कहा कि तुम सुभद्रा का हरण कर लो क्योंकि यादवों से युद्ध में विजय प्राप्त करके ही तुम सुभद्रा से विवाह कर सकते हो। अर्जुन ने सुभद्रा का हरण कर लिया। यादवों ने अर्जुन का पीछा किया तथा घोर युद्ध छिड़ गया। अर्जुन के सामने यादवों की एक न चली। श्रीकृष्ण ने यादवों को समझा-बुझाकर युद्ध बंद करा दिया। सुभद्रा को लेकर अर्जुन पुष्कर तीर्थ में बहुत दिनों तक रहे। वनवास के दिन पूरे होने के बाद वे सुभद्रा के साथ इंद्रप्रस्थ पहुँचे तो माता कुंती तथा सभी पांडवों की प्रसन्नता की सीमा न रही। अर्जुन को सुभद्रा से अभिमन्युतथा द्रौपदी से पांडवों को पाँच पुत्र प्राप्त हुए

खांडव-दाह

एक दिन अर्जुन और श्रीकृष्ण कुछ बातचीत कर रहे थे, तभी अग्निदेव ब्राह्मण के वेश में उनके सामने आए। अग्निदेव को अजीर्ण का रोग हो गया था, जिसकी केवल एक ही दवा थी कि खांडव वन के जीव उन्हें जलाने को मिलें। इसी वन में इंद्र का मित्र तक्षक सर्प भी रहता था। अग्निदेव देव जब भी खांडव वन जलाने की कोशिश करते, इंद्र वर्षा करा देते। अग्निदेव ने अर्जुन से सहायता माँगी। अर्जुन ने कहा कि मैं सहायता करने को तैयार हूँ, पर मेरे पास इंद्र का सामना करने के लिए उपयुक्त शस्त्र नहीं हैं। अग्निदेव ने अर्जुन को 'गांडीव' नाम का विशाल धनुष, 'अक्षय तूणीर' तथा 'नंदिघोष' नाम का विशाल रथ दिया। अर्जुन के संकेत पर अग्निदेव ने खांडव वन को जलाना शुरू कर दिया। इंद्र ने आग बुझाने के लिए बादलों को उड़ा दिया। तब इंद्र स्वयं अर्जुन से युद्ध करने आए। दोनों में घमासान युद्ध हुआ। इंद्र अर्जुन की वीरता पर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन ने इंद्र से कहा कि यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे दिव्यास्त्र दीजिए। इंद्र ने कहा कि दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए तुम्हें शंकर की आराधना करनी पड़ेगी। खांडव वन में केवल कुछ ही प्राणी बचे थे, जिनमें एक मय दानव भी था, जो कुशल शिल्पी था। अर्जुन ने उसे मित्र बना लिया। मय दानव ने कहा कि आपसे प्राण-रक्षा के बदले में मैं आपकी कुछ सेवा करना चाहता हूँ। अर्जुन ने मय दानव से युधिष्ठिर के लिए इंद्रप्रस्थ में अनुपम सभा-भवन का निर्माण करने को कहा, जिसे मय दानव ने सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया।

  • आदि पर्व के अन्तर्गत कुल उन्नीस (उप) पर्व और 233 अध्याय हैं। इन 19 (उप) पर्वों के नाम हैं-
  • अनुक्रमणिका पर्व
  • पर्वसंग्रह पर्व
  • पौष्य पर्व
  • पौलोम पर्व
  • आस्तीक पर्व
  • अंशावतार पर्व
  • सम्भव पर्व
  • जतुगृह पर्व
  • हिडिम्बवध पर्व
  • बकवध पर्व
  • चैत्ररथ पर्व
  • स्वयंवर पर्व
  • वैवाहिक पर्व,
  • विदुरागमनराज्यलम्भ पर्व
  • अर्जुनवनवास पर्व
  • सुभद्राहरण पर्व
  • हरणाहरण पर्व
  • खाण्डवदाह पर्व
  • मयदर्शन पर्व

टीका टिप्पणी 
👉महाभारत में उल्लेख है कि युयुत्सु वैश्या से उत्पन्न पुत्र था 👉यज्ञसेन का ही नाम द्रुपद था


एक दिन अर्जुन राजभवन के द्वार पर बैठे थे, तभी एक ब्राह्मण रोता हुआ आया और उसने बताया कि चोर उसकी गाएँ चुरा ले गए हैं। अर्जुन उस समय निरस्त्र थे। उनके अस्त्र घर में थे, जहाँ युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ थे। अर्जुन धर्म-संकट में पड़ गए। यदि हथियार लेने घर में जाते हैं, तो बारह वर्ष का वनवास होगा और यदि गायों को नहीं छुड़ाते तो ब्राह्मण से शाप मिलेगा। अंत में वे सिर झुकाकर घर में गए तथा अस्त्र ले आए। उन्होंने ब्राह्मण की गायें छुड़ाकर ब्राह्मण को दे दी। अर्जुन ने युधिष्ठिर से बारह वर्ष के वनवास की आज्ञा माँगी। युधिष्ठिर ने बहुत समझाया, पर अर्जुन, माता कुंती तथा भाइयों से मिलकर बारह वर्ष के वनवास के लिए निकल पड़े। 


👉च्यवन हिन्दू मान्यताओं और पौराणिक महाकाव्य महाभारत के उल्लेखानुसार महान भृगु ऋषि के पुत्र थे। इनकी माता का नाम 'पुलोमा' था। ऋषि च्यवन को महान ऋषियों की श्रेणी में रखा जाता है। इनके विचारों एवं सिद्धांतों द्वारा ज्योतिष में अनेक महत्त्वपूर्ण बातों का आगमन हुआ। इस कारण यह ज्योतिष गुरु के रूप में भी प्रसिद्ध हुए थे। च्यवन ऋषि द्वारा रचित ग्रंथों से ज्योतिष तथा जीवन के सही मार्गदर्शन का बोध होता है।

👉

पुलोमा - Krishnakosh

पुलोमा हिन्दू मान्यताओं और पौराणिक महाकाव्य महाभारत के उल्लेखानुसार वैश्वानर नामक दैत्य की चार पुत्रियों में से एक थी, जो ऋषि भृगु की पत्नी थी। अन्य मत से यह कश्यप[1]की पत्नी थी।[2] पुलोमा के पुत्र महर्षि च्यवन थे।

आश्रम में राक्षस का आगमन

पुलोमा अपने पति भृगु को बहुत ही प्यारी थी। उसके उदर में भृगु के वीर्य से उत्पन्न गर्भ पल रहा था। उनकी कुक्षि में उस गर्भ के प्रकट होने पर एक समय धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भृगु जी स्नान करने के लिये आश्रम से बाहर निकले। उस समय एक राक्षस, जिसका नाम भी पुलोमा ही था, उनके आश्रम पर आया। आश्रम में प्रवेश करते ही उसकी दृष्टि महर्षि भृगु की पतिव्रता पत्नी पर पड़ी और वह कामदेव के वशीभूत हो अपनी सुध-बुध खो बैठा। सुन्दरी ने उस राक्षस को अभ्यागत अतिथि मानकर वन में फल-मूल आदि से उसका सत्कार करने के लिये उसे न्योता दिया। वह राक्षस काम से पीड़ित हो रहा था। उस समय उसने वहाँ पुलोमा को अकेली देख बड़े हर्ष का अनुभव किया, क्योंकि वह सती-साध्वी पुलोमा को हर ले जाना चाहता था। मन में उस शुभ लक्षणा सती के अपहरण की इच्छा रखकर वह प्रसन्नता से फूल उठा। पवित्र मुस्कान वाली पुलोमा को पहले उस पुलोमा नामक राक्षस ने वरण[3] किया था।[4] किन्तु पीछे उसके पिता ने शास्त्र विधि के अनुसार महर्षि भृगु के साथ उसका विवाह कर दिया। उसके पिता का वह अपराध राक्षस के हृदय में सदा काँटे सा कसकता रहता था। यही अच्छा मौका है, ऐसा विचार कर उसने उस समय पुलोमा को हर ले जाने का पक्का निश्चय कर लिया।

अग्निदेव और राक्षस की वार्ता

इतने में ही राक्षस ने देखा, अग्निहोत्र गृह में अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे हैं। तब पुलोमा राक्षस ने उस समय प्रज्वलित पावक से पूछा- "अग्निदेव! मैं सत्य की शपथ देकर पूछता हूँ, बताओ, यह किसकी पत्नी है? पावक! तुम देवताओं के मुख हो। अतः मेरे पूछने पर ठीक-ठीक बताओ। पहले तो मैंने ही इस सुन्दरी को अपनी पत्नी बनाने के लिये वरण किया था। किन्तु बाद में असत्य व्यहार करने वाले इसके पिता ने भृगु के साथ इसका विवाह कर दिया। यदि यह एकान्त में मिली हुई सुन्दरी भृगु की भार्या है तो वैसी बात सच-सच बता दो; क्योंकि मैं इसे इस आश्रम से हर ले जाना चाहता हूँ। वह क्रोध आज मेरे हृदय को दग्ध सा कर रहा है। इस सुमध्यमा को, जो पहले मेरी भार्या थी, भृगु ने अन्यायपूर्वक हड़प लिया है।" इस प्रकार वह राक्षस भृगु की पत्नी के प्रति, यह मेरी है या भृगु की। ऐसा संशय रखते हुए प्रज्वलित अग्नि को सम्बोधित करके बार-बार पूछने लगा- "अग्निदेव! तुम सदा सब प्राणियों के भीतर निवास करते हो। सर्वज्ञ अग्ने! तुम पुण्य और पाप के विषय में साक्षी की भाँति स्थित रहते हो; अतः सच्ची बात बताओ। असत्य बर्ताव करने वाले भृगु ने, जो पहले मेरी ही थी, उस भार्या का अपहरण किया है। यदि यह वही है तो वैसी बात ठीक-ठीक बता दो। सर्वज्ञ अग्निदेव! तुम्हारे मुख से सब बातें सुनकर भृगु की इस भार्या को तुम्हारे देखते-देखते इस आश्रम से हर ले जाऊँगा; इसलिये मुझसे सच्ची बात कहो।"

राक्षस की यह बात सुनकर ज्वालामयी सात जिह्वाओं वाले अग्निदेव बहुत दु:खी हुए। एक ओर वे झूठ से डरते थे तो दूसरी ओर भृगु के शाप से; अतः धीरे से इस प्रकार बोले- "दानवनन्दन! इसमें संदेह नहीं कि पहले तुम्हीं ने इस पुलोमा का वरण किया था, किन्तु विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते हुए इसके साथ तुमने विवाह नहीं किया था। पिता ने तो यह यशस्विनी पुलोमा भृगु को ही दी है। तुम्हारे वरण करने पर भी इसके महायशस्वी पिता तुम्हारे हाथ में इसे इसलिये नहीं देते कि उनके मन में तुमसे श्रेष्ठ वर मिल जाने का लोभ था। दानव! तदनन्तर महर्षि भृगु ने मुझे साक्षी बनाकर वेदोक्त क्रिया द्वारा विधिपूर्वक इसका पाणिग्रहण किया था। यह वही है, ऐसा मैं जानता हूँ। इस विषय में मैं झूठ नहीं बोल सकता। दानवश्रेष्ठ! लोक में असत्य की कभी पूजा नहीं होती है।"[5]

राक्षस का भस्म होना

अग्नि का यह वचन सुनकर उस राक्षस ने वराह का रूप धारण करके मन और वायु समान वेग से सुन्दरी पुलोमा का अपहरण किया। उस समय वह गर्भ जो अपनी माता की कुक्षि में निवास कर रहा था, अत्यन्त रोष के कारण योग बल से माता के उदर से च्युत होकर बाहर निकल आया। च्युत होने के कारण ही उसका नाम च्यवन हुआ। माता के उदर से च्युत होकर गिरे हुए उस सूर्य के समान तेजस्वी गर्भ को देखते ही वह राक्षस पुलोमा को छोड़कर गिर पड़ा और तत्काल जलकर भस्म हो गया।[6]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

पौराणिक कोश |लेखक: राणा प्रसाद शर्मा |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 317 |

  1.  बाल्यावस्था में पुलोमा रो रही थी। उसके रूदन की निवृत्ति के लिये पिता ने डराते हुए कहा- "रे राक्षस! तू इसे पकड़ ले।" घर में पुलोमा राक्षस पहले से ही छिपा हुआ था। उसने मन ही मन वरण कर लिया- "यह मेरी पत्नी है।" बात केवल इतनी ही थी। इसका अभिप्राय यह है कि हँसी खेल में भी या डाँटने डपटने के लिये भी बालकों से ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये और राक्षस का नाम भी नहीं रखना चाहिये।

👉जनमेजय - Krishnakosh

जनमेजय सर्प यज्ञ करवाते हुए

जनमेजय अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित के पुत्र थे। जनमेजय की पत्नी वपुष्टमा थी, जो काशीराज की पुत्री थी। बड़े होने पर जब जनमेजय ने पिता परीक्षित की मृत्यु का कारण सर्पदंश जाना तो उसने तक्षक से बदला लेने का उपाय सोचा। जनमेजय ने सर्पों के संहार के लिए 'सर्पसत्र' नामक महान यज्ञ का आयोजन किया। नागों को इस यज्ञ में भस्म होने का शाप उनकी मां कद्रू ने दिया था। नागगण अत्यंत त्रस्त थे। समुद्र मंथन में रस्सी के रूप में काम करने के उपरान्त वासुकी ने सुअवसर पाकर अपने त्रास की गाथा ब्रह्मा से कही। उन्होंने कहा कि ऋषि जरत्कारु का पुत्र धर्मात्मा आस्तीक सर्पों की रक्षा करेगा, दुरात्मा सर्पों का नाश उस यज्ञ में अवश्यंभावी है। अत: वासुकि ने 'एलायत्र' नामक नाग की प्रेरणा से अपनी वहन जरत्कारु का विवाह ब्राह्मण जरत्कारु से कर दिया था। उनके पुत्र का नाम 'आस्तीक' रखा गया। ब्राह्मण काल के अंत में उत्पन्न कुरु वंश के राजा जनमेजय को अनेक अश्वों का स्वामी बताया गया है। आसंदीवत्र उसकी राजधानी थी। पापमुक्त होने के लिए उसके पौत्रों ने अश्वमेध यज्ञ किया था। शौनक ऋषि इस यज्ञ के पुरोहित थे।

वैदिक साहित्य में उल्लेख

वैदिक साहित्य में अनेक जनमेजयों का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रमुख जनमेजय कुरु वंश का राजा था। महाभारत युद्ध में अर्जुनपुत्र अभिमन्यु जिस समय मारा गया, उसकी पत्नी उत्तरा गर्भवती थी। उसके गर्भ में राजा परीक्षित का जन्म हुआ जो युद्ध के बाद हस्तिनापुरकी गद्दी पर बैठा। जनमेजय इसी परीक्षित का पुत्र था। उपलब्ध विवरण के अनुसार एक बार परीक्षित ने शिकार खेलते समय एक मौन ध्यानस्थ ऋषि शमीक से पानी मांगा। मौन साधना के कारण कोई उत्तर न पाकर क्रुद्ध राजा ने उन्हें ढोंगी समझा और एक मरा हुआ सर्प उनके गले में डाल दिया। ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को इसका पता चला तो उसने शाप दे दिया जिससे सातवें दिन तक्षक सर्प के काटने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई। इसी का बदला लेने के लिए जनमेजय ने पहले तक्षशिला को जीता, फिर नाग-यज्ञ किया जिसमें सर्प यज्ञकुंड में पड़ कर मरने लगे।

ऋषि का शाप

राजा परिक्षित् एक बार शिकार खेलने जाकर एक ऋषि का अपराध कर बैठे। इसके फल-स्वरूप उन्हें साँप से डसे जाकर मरने का शाप मिला। शाप का हाल सुनकर काश्यप नामक एक सर्प-विष-चिकित्सक (ओझा) राजा से मिलने को चला। उसने सोचा कि राजा को साँप के डँसते ही, मैं मंत्र और ओषधि के द्वारा चंगा करके मालामाल हो जाऊँगा। रास्ते में उससे तक्षक की भेंट हो गई। उसने ओझा के मंत्र की परीक्षा की और उसे ठीक पाया। तब उसने काश्यप से कहा कि राजा का विष उतारने के झगड़े में तुम क्यों पड़ते हो। तुम्हें सम्पदा चाहिए सो मैं यहीं दिये देता हूँ। तक्षक ने बहुत-सी सम्पत्ति देकर काश्यप को लौटा दिया और जाकर राजा को डँस लिया।

जनमेजय को ऋषि के शाप से किसी प्रकार की कुढ़न न थी। उन्हें दुख इस बात का था कि दुष्ट तक्षक ने काश्यप को रास्ते से ही क्यों लौटा दिया। उसके इस अपराध से चिढ़कर जनमेजय ने सारी सर्पजाति को नष्ट कर देने के लिए सर्पयज्ञ अनुष्ठान ठान दिया। अब क्या था, लगातार सर्प आ-आकर हवन-कुण्ड में गिरने लगे। अपराधी तक्षक डर के मारे इन्द्र की शरण में पहुँचा। अंत में अपनी रक्षा न देख इन्द्र ने भी उसका साथ छोड़ दिया। इधर वासुकी ने जब अपने भानजे, जरत्कारु मुनि के पुत्र, आस्तीक से नाना के वंश की रक्षा करने का अनुरोध किया तब वे जनमेजय के यज्ञस्थल में जाकर यज्ञ की बेहद प्रशंसा करने लगे। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उनको मुँहमाँगी वस्तु देने का वचन दिया। इस पर आस्तीक ने प्रार्थना की कि अब आप इस यज्ञ को यहीं समाप्त कर दें। ऐसा होने पर सर्पों की रक्षा हुई। राजा जनमेजय की रानी का नाम वसुष्टमा था। यह काशिराज सुवर्णवर्मा की राजकुमारी थी।

वास्तव में अपराधी तक्षक नाग था, उसी को दण्ड देना राजा जनमेजय का कर्तव्य था। किंतु क्रोध में आकर उन्होंने सारी सर्पजाति को नष्ट कर देने का बीड़ा उठाया जो अनुचित था। एक के अपराध के लिए बहुतों को दण्ड देना ठीक नहीं। जिसने अपराध किया था और जिस दण्ड देने के लिए इतनी तैयारियाँ की गई थीं वह तक्षक अंत में बेदाग़ बच गया। यह आश्चर्य की बात है।

सर्पयज्ञ

जनमेजय ने सर्पसत्र प्रारंभ किया। अनेक सर्प आह्वान करने पर अग्नि में गिरने प्रारंभ हो गये, तब भयभीत तक्षक ने इन्द्र की शरण ग्रहण की। वह इन्द्रपुरी में रहने लगा। वासुकि की प्रेरणा से आस्तीक परीक्षित के यज्ञस्थल भी पहुँचा तथा भाँति-भाँति से यजमान तथा ऋत्विजों की स्तुति करने लगा। उधर ऋत्विजों ने तक्षक का नाम लेकर आहुति डालनी प्रारंभ की। इन्द्र तक्षक को अपने उत्तरीय में छिपाकर वहाँ तक आये। यज्ञ का विराट रूप देखकर वे तक्षक को अकेला छोड़कर अपने महल में चले गये। विद्वान ब्राह्मण बालक, आस्तीक, से प्रसन्न होकर जनमेजय ने उसे एक वरदान देने की इच्छा प्रकट की तो उसने यज्ञ की तुरंत समाप्ति का वर मांगा, अत: तक्षक बच गया क्योंकि उसने अभी अग्नि में प्रवेश नहीं किया था। नागों ने प्रसन्न होकर आस्तीक को वर दिया कि जो भी इस कथा का स्मरण करेगा- सर्प कभी भी उसका दंशन नहीं करेंगे।

ब्रह्म-हत्या का दोष

जनमेजय को अनजाने में ही ब्रह्म-हत्या का दोष लग गया था। उसका सभी ने तिरस्कार किया। वह राज्य छोड़कर वन में चला गया। वहाँ उसका साक्षात्कार इन्द्रोत मुनि से हुआ। उन्होंने भी उसे बहुत फटकारा। जनमेजय ने अत्यंत शांत रहते हुए विनीत भाव से उनसे पूछा कि अनजाने में किये उसके पाप का निराकरण क्या हो सकता है तथा उसे सभी ने वंश सहित नष्ट हो जाने के लिए कहा है, उसका निराकरण कैसे होगा? इन्द्रोत मुनि ने शांत होकर उसे शांतिपूर्वक प्रायश्चित्त करने के लिए कहा। उसे ब्राह्मणों की सेवा तथा अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिए कहा। जनमेजय ने वैसा ही किया तथा निष्पाप, परम् उज्ज्वल हो गया। [1]

सुयोग्य शासक

परीक्षित-पुत्र जनमेजय सुयोग्य शासक था। बड़े होने पर उसे उत्तंक मुनि से ज्ञात हुआ कि तक्षक ने किस प्रकार परीक्षित को मारा था जिस प्रकार रूरू ने अपनी भावी पत्नी को आधी आयु दी थी वैसे परीक्षित को भी बचाया जा सकता था। मन्त्रवेत्ता कश्यप कर्पंदंशन का निराकरण कर सकते थे पर तक्षक ने राजा को बचाने जाते हुए मुनि को रोककर उनका परिचय पूछा। उनके जाने का निमित्त जानकर तक्षक ने अपना परिचय देकर उन्हें परीक्षा देने के लिए कहा। तक्षक ने न्यग्रोध (बड़) के वृक्ष को डंस लिया। कश्यप ने जल छिड़ककर वृक्ष को पुन: हरा-भरा कर दिया। तक्षक ने कश्यप को पर्याप्त धन दिया तथा जाने का अनुरोध किया। कश्यप ने योगबल से जाना कि राजा की आयु समाप्त हो चुकी है, अत: वे धन लेकर लौट गये। यह सब जानकर जनमेजय क्रुद्ध हो उठा तथा उत्तंक की प्रेरणा से उसने सर्पसत्र नामक यज्ञ किया जिससे समस्त सर्पों का नाश करने की योजना थी। तक्षक इन्द्र की शरण में गया। उत्तंक ने इन्द्र सहित तक्षक का आवाहन किया। जरत्कारु के धर्मात्मा पुत्र आस्तीक ने राजा का सत्कार ग्रहण कर मनवांक्षित फल मांगा, फलत: राजा को सर्पसत्र नामक यज्ञ को समाप्त करना पड़ा। राजा ने उसे तो संतुष्ट किया किंतु स्वयं अशांत चित्त हो गया। व्यास से उसने समस्त महाभारत सुनी तथा जाना कि आस्तीक ने सर्पों की रक्षा क्यों की।


👉नाग

Disamb2.jpgनागएक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- नाग (बहुविकल्पी)
नाग

नाग पुराणों के उल्लेखानुसार भारत के प्रत्येक राज्य में नाग पाया जाता है। जिनमें काली गरदन वाला नाग अधिक व्यापक है।

  • भारत में नाग को करिया, करैत या कहीं-कहीं फेटार भी कहते हैं। नाग ज़मीन पर रहने वाला साँप है। पर पेड़ों पर भी चढ़ जाता है और पानी पर भी तैर लेता है।
  • हिंदू धार्मिक ग्रंथों में कई जगह वासुकितक्षक,कालदन्‍तककालिय आदि मुख्य नागों का उल्लेख मिलता है।


वासुकि नाग

वासुकि पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रसिद्ध नागराज थे। इनका जन्म कश्यप के औरस और कद्रु के गर्भ से हुआ माना गया है।

महाभारत आदि पर्व[1] के अनुसार, महर्षि शौनक जी ने कहा- "सूतनन्दन! सर्पों को उनकी माता से और विनता देवी को उनके पुत्र से जो शाप प्राप्त हुआ था, उसका कारण आपने बता दिया। कद्रू और विनता को उनके पति कश्यप जी से जो वर मिले थे, वह कथा भी कह सुनायी तथा विनता के जो दोनों पुत्र पक्षी रूप में प्रकट हुए थे, उनके नाम भी आपने बताये हैं। किंतु सूतपुत्र! आप सर्पों के नाम नहीं बता रहे हैं। यदि सबका नाम बताना सम्भव न हो, तो उनमें जो मुख्य-मुख्य सर्प हैं, उन्हीं के नाम हम सुनना चाहते हैं।"


उग्रश्रवा जी ने कहा- "तपोधन! सर्पों की संख्या बहुत है; अतः उन सबके नाम तो नहीं कहूँगा, किंतु उनमें जो मुख्य-मुख्य सर्प हैं, उनके नाम मुझसे सुनिये। नागों में सबसे पहले शेष जी प्रकट हुए हैं। तदनन्तर वासुकि नागऐरावततक्षककर्कोटकधनंजयकालियमणिनागआपूरणपिञजरकएलापत्रवामननीलअनीलकल्माषशबलआर्यक नागउग्रक नागकलशपोतकसुमनाख्य नागदधिमुखविमलपिण्डक नागआप्त, कर्कोटक (द्वितीय), शंखवालिशिखनिष्टानकहेमगुह नागनहुषपिंगल नागबाह्मकर्णहस्तिपदमुद्ररपिण्डककम्बलअश्वतर नागकालीयक नागवृत्त नागसंवतर्क, पह्म (प्रथम), पह्म (द्वितीय), शंखमुखकूष्माण्डक नागक्षेमकपिण्डारक नागकरवीरपुष्पदंष्ट्र नागबिल्वकबिल्वपाण्डुरमूषकादशंखशिरा नागपूर्णभद्र नागहरिद्रकअपराजितज्योतिक नागश्रीवह नागकौरव्यधृतराष्ट्रपराक्रमी शंखपिण्डविरजासुबाहुवीर्यवान शालिपिण्डहस्तिपिण्ड नागपिठरक नागसुमुखकोणपाशन नागकुठर नागकुंजरप्रभाकरकुमुदकुमुदाक्ष नागतित्तिरि नागहलिक नाग, महानाग कर्दमबहुमूलककर्कर नागअकर्करकुण्डोदर और महोदर- ये नाग उत्पन्न हुए।


तक्षक नाग

तक्षक पाताल[1] में निवास करने वाले आठ नागों में से एक है। यह माता कद्रू के गर्भ से उत्पन्न हुआ था तथा इसके पिता कश्यप ऋषि थे। तक्षक 'कोशवश' वर्ग का था।[2]यह काद्रवेय नाग है।[3] माना जाता है कि तक्षक का राज तक्षशिला में था।

  • श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डँसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी। इससे क्रुद्ध होकर बदला लेने की नीयत से परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्पयश किया, जिससे डरकर तक्षक इंद्र की शरण में गया।
  • इस पर जनमेजय की आज्ञा से ऋत्विजों के मंत्र पढ़ने पर इंद्र भी खिंचने लगे, तब इंद्र ने डरकर तक्षक को छोड़ दिया।[4]
  • जब तक्षक अग्निकुण्ड के समीप पहुँचा, तब आस्तीक ऋषि की प्रार्थना पर यज्ञ बंद हुआ और तक्षक के प्राण बचे।
  • यह नाग ज्येष्ठ मास के अन्य गणों के साथ सूर्य रथ पर अधिष्ठित रहता है।[5]
  • यह शिव की ग्रीवा के चारों ओर लिपटा रहता है।[6]
  • पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार भारत में तक्षक जाति थी, जिसका जातीय चिह्न सर्प था। इसका युद्ध राजा परीक्षित से हुआ था, जिसमे परीक्षित मारे गये थे। जनमेजय ने तक्षशिला के समीप इन तक्षकों से युद्ध किया और इन्हें परास्त किया था।

महाभारत आदि पर्व[7] के अनुसार, महर्षि शौनक जी ने कहा- "सूतनन्दन! सर्पों को उनकी माता से और विनता देवी को उनके पुत्र से जो शाप प्राप्त हुआ था, उसका कारण आपने बता दिया। कद्रू और विनता को उनके पति कश्यप जी से जो वर मिले थे, वह कथा भी कह सुनायी तथा विनता के जो दोनों पुत्र पक्षी रूप में प्रकट हुए थे, उनके नाम भी आपने बताये हैं। किंतु सूतपुत्र! आप सर्पों के नाम नहीं बता रहे हैं। यदि सबका नाम बताना सम्भव न हो, तो उनमें जो मुख्य-मुख्य सर्प हैं, उन्हीं के नाम हम सुनना चाहते हैं।"

कालदन्‍तक

कालदन्‍तक हिन्दू पौराणिक ग्रंथ महाभारत के अनुसार जनमेजय के सर्पयज्ञ में जला एक सर्प था। महाभारत आदिपर्व के अनुसार ये वासुकि वंशज था, जिसे माता के शाप से पीड़ित हो विवशता पूर्वक अग्नि में प्रवेश करना पड़ा था।[1]


कालिय नाग - Krishnakosh

कालिय के फन पर नृत्य करते श्रीकृष्ण

कालिय नाग कद्रू का पुत्र और पन्नग जाति का नागराज था। वह पहले रमण द्वीप में निवास करता था, किंतु पक्षीराज गरुड़ से शत्रुता हो जाने के कारण वह यमुना नदी में एक कुण्ड में आकर रहने लगा था। यमुना का यह कुण्ड गरुड़ के लिए अगम्य था, क्योंकि इसी स्थान पर एक दिन क्षुधातुर गरुड़ ने तपस्वी सौभरि के मना करने पर भी अपने अभीष्ट मत्स्य को बलपूर्वक पकड़कर खा डाला था, इसीलिए महर्षि सौभरि ने गरुड़ को शाप दिया था कि यदि गरुड़ फिर कभी इस कुण्ड में घुसकर मछलियों को खायेंगे तो उसी क्षण प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। कालिय नाग यह बात जानता था, इसीलिए वह यमुना के उक्त कुण्ड में रहने आ गया था।

यमुना में विष प्रभाव

कालिय नाग जिस कुण्ड में निवास करता था, उसका जल विष की गर्मी से खौलता रहता था। यहाँ तक कि उसके ऊपर उड़ने वाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे। उसके विषैले जल की उत्ताल तरंगों का स्पर्श करके तथा उसकी छोटी-छोटी बूंदें लेकर जब वायु बाहर आती और तट के घास-पात, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि का स्पर्श करती, तब वे उसी समय मर जाते थे। श्रीकृष्ण ने देखा कि कालिय नाग के विष का वेग बड़ा प्रचण्ड है और वह भयानक विष ही उसका महान बल है तथा उसके कारण मेरे विहार का स्थान यमुना भी दूषित हो गई है। इसीलिए एक दिन अपने सखाओं के साथ गेंद खेलते हुए कृष्ण ने अपने सखा श्रीदामा की गेंद यमुना में फेंक दी। अब श्रीदामा गेंद वापस लाने के लिए कृष्ण से जिद करने लगे। सब सखाओं के समझाने पर भी श्रीदामा नहीं माने और गेंद वापस लाने के लिए कहते रहे।

कृष्ण से संघर्ष

कृष्ण ने सखाओं को धीरज बंधाया और पास के एक कदम्ब के पेड़ पर चढ़ गए। श्रीकृष्ण के द्वारा स्पर्श करने पर कदम्ब का वह पेड़ जो ठूंठ हो चुका था, फिर से सहसा हरा-भरा हो उठा। उसमें जनजीवन की बहार आ गई। कदम्ब पर चढ़कर कृष्ण ने यमुना के जल में छलांग लगा दी। उनके जल में कूदते ही यमुना का जल इस प्रकार आप्लावित हुआ जैसे यमुना में कोई बृहदाकार कोई वस्तु आ गई हो। फिर आप्लावित जल यमुना के किनारों से भी ऊपर आ गया। ‘'कालिय'! कृष्ण ने इस भयंकर विषधर को चेतावनी देते हुए कहा- "अब निरीह प्राणियों पर होने वाले अत्याचारों का समय समाप्त हो चुका है।" अपनी अनेक पत्नियों और पुत्रों के साथ कालियदह में निवास करता हुआ कालिय भुजंग एक बालक की चेतावनी सुनकर क्रोध में फुफकार उठा और तुरंत अपने निवास स्थान से बाहर निकल आया। कालिय ने फुफकारते हुए भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण कर दिया।

सभी ग्वाल-बाल चिंता-निमग्न हुए कृष्ण की लीला को निहार रहे थे। उनमें से कुछ ग्वाल-बाल वृंदावन में नंद-यशोदा के पास जाकर इस बात की सूचना दे आए कि कृष्ण कालियदह में यमुना में कूद गए हैं और अब कालिय नाग से युद्ध कर रहे हैं। कालिय ने कृष्ण को एक साधारण बालक समझकर अपनी कुंडली में दबोच लिया और उन पर भयंकर विष की फुफकारें छोड़ने लगा, किंतु उस समय कालिय को बड़ा आश्चर्य हुआ, जब उसकी तीव्रतम फुफकारों का भी उन पर कोई प्रभाव न पड़ा। कृष्ण को कालिय भुजंग की कुंडली में जकड़ा देखकर माता यशोदा काँप उठीं कि उनके कोमल शरीर वाले प्राणों से प्रिय दुलारे को कालिय नाग ने कितनी बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। माता यशोदा दौड़ती हुई यमुना की ओर बढ़ने लगीं और यमुना के जल में कूदना ही चाहती थीं कि उन्हें वहाँ उपस्थित ग्वालों ने संभाल लिया। वृंदावन के सभी बाल-वृद्ध इस समय यमुना तट पर आ खड़े हुए थे। उनके मन में कृष्ण के प्रति गहन चिंता और नयनों में वियोग के आँसू थे। अब वे इस बात को समझ चुके थे कि कृष्ण कालिय नाग से युद्ध में जीत नहीं सकते, इसलिए उनकी व्याकुलता और भी बढ़ गई थी।

कालिय की पराजय

लगभग दो घंटे तक कालिय ने कृष्ण को एक सामान्य बालक की भाँति ही अपने कुंडली पाश में जकड़े रखा। जब कृष्ण ने देखा कि वृंदावन के समस्त नर-नारी उनके वियोग में बुरी तरह तड़प रहे हैं और नंद-यशोदा की दशा तो इतनी बिगड़ चुकी है कि वे कदाचित मृत्यु के निकट ही जान पड़ते हैं, तो उन्होंने एक झटके में ही स्वयं को कालिय की कुंडली से विमुक्त कर लिया। कृष्ण उस विकराल सर्प पर इस प्रकार टूट पड़े जैसे गरुड़ किसी सर्प को अपना शिकार बनाता है। कालिय कृष्ण के प्रहारों को सहन न कर सका और शीघ्र ही थककर चूर हो गया। कृष्ण उछलकर कालिय के फनों पर चढ़ गए और उस पर पैरों से प्रहार करने लगे। वृंदावन के सभी नर-नारियों ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण के एक हाथ में बाँसुरी थी और दूसरे हाथ में वह गेंद थी, जिसे लेने का बहाना बनाकर वे यमुना में कूदे थे। कालिय नाग के फनों पर पाद-प्रहार करते हुए वह उन पर नृत्य कर रहे थे और बाँसुरी बजा रहे थे। कृष्ण के पाद-प्रहारों से कालिय शीघ्र ही रक्त-वमन करने लगा। उसका शरीर निस्तेज और निर्बल होता चला गया। कृष्ण को इस स्थिति में नृत्य करते देख वृंदावनवासियों ने उनकी उच्च स्वर में जय-जयकार करनी आरंभ कर दी। अपने सबल पति को इस प्रकार निर्बल होते देख नाग-पत्नियाँ तुरंत समझ गईं कि उनके पति पर विजय पाने वाला यह बालक कोई सामान्य बालक नहीं, बल्कि साक्षात परमेश्वर ही हैं। नाग-पत्नियाँ तुरंत अपनी सभी संतानों को लेकर प्रभु श्रीकृष्ण की शरण में आ गईं और नतमस्तक होकर उनकी स्तुति करने लगीं।

अभयदान

नाग-पत्नियों द्वारा इस विनती से श्रीकृष्ण दयार्द्र हो उठे और उन्होंने कालिय नाग को अपने पाश से मुक्त कर दिया। पाश से मुक्त होते ही कालिय नाग के शरीर में प्राण का संचार होने लगा। यह भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख अपने समस्त फन झुकाकर विनीत स्वर में बोला- "हे स्वामी! आपको पहचानने में मुझसे भूल हो गई।" श्रीकृष्ण ने उनकी स्तव-स्तुति से प्रसन्न होकर कालिय नाग को अभय प्रदान कर सपरिवार 'रमणक द्वीप' में जाने के लिए आदेश दिया तथा उसे अभय देते हुए बोले- "अब तुम्हें गरुड़ का भय नहीं रहेगा। वे तुम्हारे फणों पर मेरे चरणचिह्न को देखकर तुम्हारे प्रति शत्रुता भूल जायेंगे।

श्रीमद्भागवत महापुराण का उल्लेख

'श्रीमद्भागवत महापुराण'[1] के अनुसार- श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "परीक्षितभगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि महाविषधर कालिय नाग ने यमुना का जल विषैला कर दिया है। तब यमुनाजी को शुद्ध करने के विचार से उन्होंने वहाँ से सर्प को निकाल दिया। राजा परीक्षित ने पूछा- 'ब्रह्मन! भगवान श्रीकृष्ण ने यमुनाजी के अगाध जल में किस प्रकार उस सर्प का दमन किया? फिर कालिय नाग तो जलचर जीव नहीं था, ऐसी दशा में वह अनेक युगों तक जल में क्यों और कैसे रहा? सो बतलाइये। ब्रह्मस्वरूप महात्मन! भगवान अनन्त हैं। वे अपनी लीला प्रकट करके स्वच्छन्द विहार करते हैं। गोपालरूप से उन्होंने जो उदार लीला की है, वह तो अमृतस्वरूप है। भला, उसके सेवन से कौन तृप्त हो सकता है?


Kaliya-Mardan-krishna-2.jpg

श्रीशुकदेवजी ने कहा- "परीक्षित! यमुनाजी में कालिय नाग का एक कुण्ड था। उसका जल विष की गर्मी से खौलता रहता था। यहाँ तक कि उसके ऊपर उड़ने वाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे। उसके विषैले जल की उत्ताल तरंगों का स्पर्श करके तथा उसकी छोटी-छोटी बूँदे लेकर जब वायु बाहर आती और तट के घास-पात, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि का स्पर्श करती, तब वे उसी समय मर जाते थे। परीक्षित! भगवान का अवतार तो दुष्टों का दमन करने के लिये होता ही है। जब उन्होंने देखा कि उस साँप के विष का वेग बड़ा प्रचण्ड (भयंकर) है और वह भयानक विष ही उसका महान बल है तथा उसके कारण मेरे विहार का स्थान यमुनाजी भी दूषित हो गयी हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण अपनी कमर का फेंटा कसकर एक बहुत ऊँचे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये और वहाँ से ताल ठोंककर उस विषैले जल में कूद पड़े। यमुनाजी का जल साँप के विष के कारण पहले से ही खौल रहा था। उसकी तरंगें लाल-पीली और अत्यन्त भयंकर उठ रहीं थीं। पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के कूद पड़ने से उसका जल और भी उछलने लगा। उस समय तो कालियदह का जल इधर-उधर उछलकर चार सौ हाथ तक फ़ैल गया। अचिन्त्य अनन्त बलशाली भगवान श्रीकृष्ण के लिये इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। प्रिय परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण कालियादह में कूदकर अतुल बलशाली मतवाले गजराज के समान जल उछालने लगे। इस प्रकार जल-क्रीड़ा करने पर उनकी भुजाओं की टक्कर से जल में बड़े जोर का शब्द होने लगा। आँख से ही सुनने वाले कालिय नाग ने वह आवाज़ सुनी और देखा कि कोई मेरे निवासस्थान का तिरस्कार कर रहा है। उसे यह सहन न हुआ। वह चिढ़कर भगवान श्रीकृष्ण के सामने आ गया। उसने देखा कि सामने एक साँवला-सलोना बालक है। वर्षाकालीन मेघ के समान अत्यन्त सुकुमार शरीर है, उसमें लगकर आँखें हटने का नाम ही नहीं लेतीं। उसके वक्षःस्थल पर एक सुनहली रेखा-श्रीवत्स का चिह्न है और वह पीले रंग का वस्त्र धारण किये हुए है। बड़े मधुर एवं मनोहर मुख पर मन्द-मन्द मुस्कान अत्यन्त शोभायमान हो रही है। चरण इतने सुकुमार और सुन्दर हैं, मानो कमल की गद्दी हो। इतना आकर्षक रूप होने पर भी जब कालिय नाग ने देखा कि बालक तनिक भी न डरकर इस विषैले जल में मौज से खेल रहा है, तब उसका क्रोध और भी बढ़ गया। उसने श्रीकृष्ण को मर्मस्थानों में डंसकर अपने शरीर के बन्धन से उन्हें जकड़ लिया।

भगवान श्रीकृष्ण नागपाश में बँधकर निश्चेष्ट हो गये। यह देखकर उनके प्यारे सखा ग्वालबाल बहुत ही पीड़ित हुए और उसी समय दुःख, पश्चाताप और भय से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। क्योंकि उन्होंने अपने शरीर, सुहृद, धन-सम्पत्ति, स्त्री, पुत्र, भोग और कामनाएँ-सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण को ही समर्पित कर रखा था। गाय, बैल, बछिया और बछड़े बड़े दुःख से डकराने लगे। श्रीकृष्ण की ओर ही उनकी टकटकी बँध रही थी। वे डरकर इस प्रकार खड़े हो गये, मानो रो रहे हों। उस समय उनका शरीर हिलता-डोलता तक न था।

इधर ब्रज में पृथ्वी, आकाश और शरीरों में बड़े भयंकर-भयंकर तीनों प्रकार के उत्पात उठ खड़े हुए, जो इस बात की सूचना दे रहे थे कि बहुत ही शीघ्र कोई अशुभ घटना घटने वाली है। नन्दबाबा आदि गोपों ने पहले तो उन अशकुनों को देखा और पीछे से यह जाना कि आज श्रीकृष्ण बिना बलराम के ही गाय चराने चले गये। वे भय से व्याकुल हो गये। वे भगवान का प्रभाव नहीं जानते थे। इसलिये उन अशकुनों को देखकर उनके मन में यह बात आयी कि आज तो श्रीकृष्ण की मृत्यु ही हो गयी होगी। वे उसी क्षण दुःख, शोक और भय से आतुर हो गये। क्यों न हों, श्रीकृष्ण ही उनके प्राण, अन और सर्वस्व जो थे। प्रिय परीक्षित! ब्रज के बालक, वृद्ध और स्त्रियों का स्वभाव गायों जैसा ही वात्सल्यपूर्ण था। वे मन में ऐसी बात आते ही अत्यन्त दीन हो गये और अपने प्यारे कन्हैया को देखने की उत्कृष्ट लालसा से घर-द्वार छोड़कर निकल पड़े। बलरामजी स्वयं भगवान के स्वरूप और सर्वशक्तिमान हैं। उन्होंने जब ब्रजवासियों को इतना कातर और इतना आतुर देखा, तब उन्हें हँसी आ गयी। परन्तु वे कुछ बोले नहीं, चुप ही रहे। क्योंकि वे अपने छोटे भाई श्रीकृष्ण का प्रभाव भलीभाँति जानते थे। ब्रजवासी अपने प्यारे श्रीकृष्ण को ढूँढने लगे। कोई अधिक कठिनाई न हुई; क्योंकि मार्ग में उन्हें भगवान के चरणचिह्न मिलते जाते थे। जौ, कमल, अंकुश आदि से युक्त होने के कारण उन्हें पहचान होती जाती थी। इस प्रकार वे यमुना तट की ओर जाने लगे।

परीक्षित! मार्ग में गौओं और दूसरों के चरणचिह्नों के बीच-बीच में भगवान के चरणचिह्न भी दीख जाते थे। उनमें कमल, जौ, अंकुश, ब्रज और ध्वजा के चिह्न बहुत ही स्पष्ट थे। उन्हें देखते हुए वे बहुत शीघ्रता से चले। उन्होंने दूर से ही देखा कि कालिय नाग के शरीर से बँधे हुए श्रीकृष्ण चेष्टाहीन हो रहे हैं। कुण्ड के किनारे पर ग्वालबाल अचेत हुए पड़े हैं और गौएँ, बैल, बछड़े आदि बड़े आर्तस्वर से डकरा रहे हैं। यह सब देखकर वे सब गोप अत्यन्त व्याकुल और अन्त में मुर्च्छित हो गये। गोपियों का मन अनन्त गुणगुणनिलय भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम के रंग में रँगा हुआ था। वे तो नित्य-निरन्तर भगवान के सौहार्द, उनकी मधुर मुस्कान, प्रेमभरी चितवन तथा मीठी वाणी का ही स्मरण करती रहती थीं। जब उन्होंने देखा कि हमारे प्रियतम श्यामसुन्दर को काले साँप ने जकड़ रखा है, तब तो उनके हृदय में बड़ा ही दुःख और बड़ी ही जलन हुई। अपने प्राणवल्लभ जीवनसर्वस्व के बिना उन्हें तीनों लोक सूने दीखने लगे।

माता यशोदा तो अपने लाड़ले लाल के पीछे कालियदह में कूदने ही जा रही थी; परन्तु गोपियों ने उन्हें पकड़ लिया। उनके हृदय में भी वैसी ही पीड़ा थी। उनकी आँखों से भी आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी। सबकी आँखों से भी आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी। सबकी आँखें श्रीकृष्ण के मुखकमल लगी थीं। जिनके शरीर में चेतना थी, वे ब्रजमोहन श्रीकृष्ण की पूतना वध आदि की प्यारी-प्यारी ऐश्वर्य लीलाएँ कह-कह कर यशोदाजी को धीरज बँधाने लगीं। किन्तु अधिकांश तो मुर्दे की तरह पड़ ही गयी थीं। परीक्षितनन्दबाबाआदि ने जीवन-प्राण तो श्रीकृष्ण ही थे। वे श्रीकृष्ण के लिये कालियदह में घुसने लगे। यह देखकर श्रीकृष्ण का प्रभाव जानने वाले भगवान बलरामजी ने किन्हीं को समझा-बुझाकर, किन्हीं को बलपूर्वक और किन्हीं को उनके हृदयों में प्रेरणा करके रोक दिया।

परीक्षित! यह साँप के शरीर से बँध जाना तो श्रीकृष्ण की मनुष्यों-जैसी एक लीला थी। जब उन्होंने देखा कि ब्रज के सभी लोग स्त्री और बच्चों के साथ मेरे लिये इस प्रकार अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं और सचमुच मेरे सिवा इनका कोई दूसरा सहारा भी नहीं है, तब वे एक मुहूर्त तक सर्प के बन्धन में रहकर बाहर निकल आये। भगवान श्रीकृष्ण ने उस समय अपना शरीर फुलाकर खूब मोटा कर लिया। इससे साँप का शरीर टूटने लगा। वह अपना नागपाश छोड़कर अलग खड़ा हो गया और क्रोध से आग बबूला हो अपने फण ऊँचा करके फुफकारें मारने लगा। घात मिलते ही श्रीकृष्ण पर चोट करने के लिये वह उनकी ओर टकटकी लगाकर देखने लगा। उस समय उसके नथुनों से विष की फुहारें निकल रही थीं। उसकी आँखें स्थिर थीं और इतनी लाल-लाल हो रही थीं, मानो भट्ठी पर तपाया हुआ खपड़ा हो। उसके मुँह से आग की लपटें निकल रही थीं। उस समय कालिय नाग अपनी दुहरी जीभ लपलपाकर अपने होंठों के दोनों किनारों को चाट रहा था और अपनी कराल आँखों से विष की ज्वाला उगलता जा रहा था। अपने वाहन गरुड़ के समान भगवान श्रीकृष्ण उसके साथ खेलते हुए पैतरा बदलने लगे और वह साँप भी उन पर चोट करने का दाँव देखता हुआ पैतरा बदलने लगा। इस प्रकार पैतरा बदलते-बदलते उसका बल क्षीण हो गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसके बड़े-बड़े सिरों को तनिक दबा दिया और उछलकर उन पर सवार हो गये। कालिय नाग के मस्तकों पर बहुत-सी लाल-लाल मणियाँ थीं। उनके स्पर्श से भगवान के सुकुमार तलुओं की लालिमा और भी बढ़ गयी। नृत्य-गान आदि समस्त कलाओं के आदिप्रवर्तक भगवान श्रीकृष्ण उसके सिरों पर कलापूर्ण नृत्य करने लगे। भगवान के प्यारे भक्त गन्धर्व, सिद्ध, देवता, चारण और देवांगनाओं ने जब देखा कि भगवान नृत्य करना चाहते हैं, तब वे बड़े प्रेम से मृदंग, ढोल, नगारे आदि बाजे बजाते हुए, सुन्दर-सुन्दर गीत गाते हुए, पुष्पों की वर्षा करते हुए और अपने को निछावर करते हुए भेंट ले-लेकर उसी समय भगवान के पास आ पहुँचे। परीक्षित! कालिय नाग के एक सौ एक सिर थे। वह अपने जिस सिर को नहीं झुकता था, उसी को प्रचण्ड दण्डधारी भगवान अपने पैरों कि चोट से कुचल डालते। उससे कालिय नाग की जीवन शक्ति क्षीण हो चली, वह मुँह और नथनों से खून उगलने लगा। अन्त में चक्कर काटते-काटते वह बेहोश हो गया।

तनिक भी चेत होता तो वह अपनी आँखों से विष उगलने लगता और क्रोध के मारे जोर-जोर से फुफकारें मारने लगता। इस प्रकार वह अपने सिरों में से जिस सिर का ऊपर उठाता, उसी को नाचते हुए भगवान श्रीकृष्ण अपने चरणों की ठोक से झुकाकर रौंद डालते। उस समय पुराण-पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के चरणों पर जो खून की बूँदे पड़ती थीं, उनसे ऐसा मालूम होता, मानो रक्त-पुष्पों से उनकी पूजा की जा रही हो। परीक्षित! भगवान के इस अद्भुत ताण्डव-नृत्य से कालिय के फणरूप छत्ते छिन्न-भिन्न हो गये। उसका एक-एक अंग चूर-चूर हो गया और मुँह से खून की उलटी होने लगी। अब उसे सारे जगत के आदि शिक्षक पुराणपुरुष भगवान नारायण की स्मृति हुई। वह मन-ही-मन भगवान की शरण में गया। भगवान श्रीकृष्ण के उदर में सम्पूर्ण विश्व है। इसलिये उनके भारी बोझ से कालिय नाग के शरीर की एक-एक गाँठ ढीली पड़ गयी। उनकी एड़ियों की चोट से उसके छत्र के समान फण छिन्न-भिन्न हो गये। अपने पति की यह दशा देखकर उसकी पत्नियाँ भगवान की शरण में आयीं। वे अत्यन्त आतुर हो रही थीं। भय के मारे उनके वस्त्राभूषण अस्त-व्यस्त हो रहे थे और केश की चोटियाँ भी बिखर रही थीं। उस समय उन साध्वी नागपत्नियों के चित्त में बड़ी घबराहट थी। अपने बालकों को आगे करके वे पृथ्वी पर लोट गयीं और हाथ जोड़कर उन्होंने समस्त प्राणियों के एकमात्र स्वामी भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। भगवान श्रीकृष्ण को शरणागतवत्सल जानकर अपने अपराधी पति को छुड़ाने की इच्छा से उन्होंने उनकी शरण ग्रहण की।

नागपत्नियों ने कहा- "प्रभो! आपका यह अवतार ही दुष्टों को दण्ड देने के लिये हुआ है। इसलिये इस अपराधी को दण्ड देना सर्वथा उचित है। आपकी दृष्टि में शत्रु और पुत्र का कोई भेदभाव नहीं है। इसलिये आप जो किसी को दण्ड देते हैं, वह उसके पापों का प्रायश्चित कराने और उसका परम कल्याण करने के लिये ही है। आपने हम लोगों पर यह बड़ा ही अनुग्रह किया। यह तो आपका कृपा-प्रसाद ही है। क्योंकि आप जो दुष्टों को दण्ड देते हैं, उससे उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस सर्प के अपराधी होने में तो कोई संदेह ही नहीं है। यदि यह अपराधी न होता तो इसे सर्प की योनि ही क्यों मिलती? इसलिये हम सच्चे हृदय से आपके इस क्रोध को भी आपका अनुग्रह ही समझती हैं। अवश्य ही पूर्वजन्म में इसने स्वयं मान रहित होकर और दूसरों का सम्मान करते हुए कोई बहुत बड़ी तपस्या की है। अथवा सब जीवों पर दया करते हुए इसने कोई बहुत बड़ा धर्म किया है, तभी तो आप इसके ऊपर संतुष्ट हुए हैं। क्योंकि सर्व-जीवनस्वरूप आपकी प्रसन्नता का यही उपाय है। भगवन! हम नहीं समझ पातीं कि यह इसकी किस साधना का फल है, जो यह आपके चरणकमलों की धूल का स्पर्श पाने का अधिकारी हुआ है। आपके चरणों की रज इतनी दुर्लभ है कि उसके लिये आपकी अर्धांगिनी लक्ष्मीजी को भी बहुत दिनों तक समस्त भोगों का त्याग करके नियमों का पालन करते हुए तपस्या करनी पड़ी थी।

प्रभो! जो आपके चरणों की धूल की शरण ले लेते हैं, वे भक्तजन स्वर्ग का राज्य या पृथ्वी की बादशाही नहीं चाहते। न वे रसातल का ही राज्य चाहते और न तो ब्रह्मा का पद ही लेना चाहते हैं। उन्हें अणिमादि योग-सिद्धियों की भी चाह नहीं होती। यहाँ तक कि वे जन्म-मृत्यु से छुडाने वाले कैवल्य-मोक्ष की भी इच्छा नहीं करते। स्वामी! यह नागराज तमोगुणी योनि में उत्पन्न हुआ है और अत्यन्त क्रोधी है। फिर भी इसे आपकी वह परम पवित्र चरणरज प्राप्त हुई, जो दूसरों के लिये सर्वथा दुर्लभ है; तथा जिसको प्राप्त करने की इच्छा-मात्र से ही संसार चक्र में पड़े हुए जीव को संसार के वैभव-सम्पत्ति की तो बात ही क्या-मोक्ष की भी प्राप्ति हो जाती है।


श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "परीक्षित! भगवान के चरणों की ठोकरों से कालिय नाग के फण छिन्न-भिन्न हो गये थे। वह बेसुध हो रहा था। जब नागपत्नियों ने इस प्रकार भगवान की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया। धीरे-धीरे कालिय नाग की इन्द्रियों और प्राणों में कुछ-कुछ चेतना आ गयी। वह बड़ी कठिनता से श्वास लेने लगा और थोड़ी देर के बाद बड़ी दीनता से हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण से इस प्रकार बोला- "नाथ! हम जन्म से ही दुष्ट, तमोगुणी और बहुत दिनों के बाद भी बदला लेने वाले-बड़े क्रोधी जीव हैं। जीवों के लिये अपना स्वभाव छोड़ देना बहुत कठिन है। इसी के कारण संसार के लोग नाना प्रकार के दुराग्रहों में फँस जाते हैं। विश्वविधाता! आपने ही गुणों के भेद से इस जगत में नाना प्रकार के स्वभाव, वीर्य, बल, योनि, बीज, चित्त और आकृतियों का निर्माण किया है। भगवन! आपकी ही सृष्टि में हम सर्प भी हैं। हम जन्म से ही बड़े क्रोधी होते हैं। हम इस माया के चक्कर में स्वयं मोहित हो रहे हैं। फिर अपने प्रयत्न से इस दुस्त्यज माया का त्याग कैसे करें। आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं। आप ही हमारे स्वभाव और इस माया के कारण हैं। अब आप अपनी इच्छा से-जैसा ठीक समझें-कृपा कीजिये या दण्ड दीजिये।"

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "कालिय नाग की बात सुनकर लीला-मनुष्य भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- "सर्प! अब तुझे यहाँ नहीं रहना चाहिये। तू अपने जाति-भाई, पुत्र और स्त्रियों के साथ शीघ्र ही यहाँ से समुद्र में चला जा। अब गौएँ और मनुष्य यमुना के जल का उपभोग करें। जो मनुष्य दोनों समय तुझको दी हुई मेरी इस आज्ञा का स्मरण तथा कीर्तन करे, उसे साँपों से कभी भय न हो। मैंने इस कालियदह में क्रीड़ा की है। इसलिये जो पुरुष इसमें स्नान करके जल से देवता और पितरों का तर्पण करेगा एवं उपवास करके मेरा स्मरण करता हुआ मेरी पूजा करेगा, वह सब पापों से मुक्त हो जायगा। मैं जानता हूँ कि तू गरुड़ के भय से रमणक द्वीप छोड़कर इस दह में आ बसा था। अब तेरा शरीर मेरे चरणचिह्नों से अंकित हो गया है। इसलिये जा, अब गरुड़ तुझे खायेंगे नहीं।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "भगवान श्रीकृष्ण की एक-एक लीला अद्भुत है। उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कालिय नाग और उसकी पत्नियों ने आनन्द से भरकर बड़े आदर से उनकी पूजा की। उन्होंने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला, मणि, बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गन्ध, चन्दन और अति उत्तम कमलों की माला से जगत के स्वामी गरुडध्वज भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करके उन्हें प्रसन्न किया। इसके बाद बड़े प्रेम और आनन्द से उनकी परिक्रमा की, वन्दना की और उनसे अनुमति ली। तब अपनी पत्नियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ रमणक द्वीप की, जो समुद्र में सर्पों के रहने का एक स्थान है, यात्रा की। लीला-मनुष्य भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से यमुना का जल केवल विषहीन ही नहीं, बल्कि उसी समय अमृत के समान मधुर हो गया।

👉कद्रू हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों और मान्यताओं के अनुसार दक्ष प्रजापति की कन्या और महर्षि कश्यप की पत्नी थी। ये एक हज़ार तेजस्वी नागों की माता भी थी।


👉विनता विनता दक्ष प्रजापति की पुत्री थी, जिनका विवाह कश्यप ऋषि के साथ हुआ था। हिन्दू धर्म ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार विनता पक्षियों की माता कही गई है। कई पौराणिक ग्रंथों आदि में इनका उल्लेख हुआ है। अरुण और गरुड़ इनके दो पराक्रमी पुत्र थे। अरुण को 'अनूरु' नाम से भी जाना जाता है

👉देव श्रीकृष्ण के एक हजार नामों में से एक है। इसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथ गर्ग संहिता में हुआ है।[1

👉दानव

दानव कश्यप ऋषि की पत्नी दनु के पुत्रों को कहा जाता है। यह दैत्योंअसुरों तथा राक्षसों के समान देवताओं के शत्रु थे और अपने दुर्गुणों के लिए विख्यात थे।


👉कश्यप

कश्यप प्राचीन वैदिक ऋषियों में से एक थे, जिनका उल्लेख पुराणों में हुआ है। ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य संहिताओं में भी यह नाम बहुप्रयुक्त है। इन्हें सर्वदा धार्मिक एंव रहस्यात्मक चरित्र वाला बतलाया गया है एंव अति प्राचीन कहा गया है। कश्यप के पुत्र काश्यप थे, जिन्हें पाँच अग्नियों में से एक माना जाता है।[1]

  • महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है कि- "ब्रह्मा के छः मानस पुत्रों में से एक मरीचि थे, जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति पुत्र उत्पन्न किया था।
  • कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 17 पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई, उसका विवरण निम्नांकित है-
  1. अदिति से आदित्य (देवता)
  2. दिति से दैत्य
  3. दनु से दानव
  4. काष्ठा से अश्व आदि
  5. अनिष्ठा से गन्धर्व
  6. सुरसा से राक्षस
  7. इला से वृक्ष
  8. मुनि से अप्सरागण
  9. क्रोधवशा से सर्प
  10. सुरभि से गौ और महिष
  11. सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु)
  12. ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि
  13. तिमि से यादोगण (जलजन्तु)
  14. विनता से गरुड़ और अरुण
  15. कद्रु से नाग
  16. पतंगी से पतंग
  17. यामिनी से शलभ[2]
  • 'भागवत पुराण' तथा 'मार्कण्डेय पुराण' के अनुसार कश्यप की तेरह भार्याएँ थीं।

👉दनु

दनु दक्ष प्रजापति की पुत्री तथा कश्यप ऋषि की पत्नी थीं। यह दानव माता कही जाती हैं। दनु के चालीस दानव पुत्र थे।

👉दैत्य दैत्य वायुपुराण के अनुसार दिति के गर्भ से उत्पन्न कश्यप ऋषि के पुत्र थे।[1] उन्हें 'असुर' और 'राक्षस' भी कहा गया है। हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष प्रसिद्ध दैत्य थे। दैत्यों की प्रवृत्तियाँ आसुरी थीं। आगे चलकर उनका देवताओं या सुरों से युद्ध भी हुआ। देवता दैत्यों के सौतेले भाई थे और कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी अदिति के पुत्र थे।


असुर यह लेख विशेष रूप से कृष्णकोश के लिए भारतकोश से साभार असुर एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- असुर (बहुविकल्पी) असुर देवताओं के सबसे प्रबल शत्रुओं में गिने जाते थे। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भी असुरों और देवों में सदा युद्ध होता रहा। असुरों ने भारत में अनेकों वर्ष तक शासन किया था। इसके बाद उन्होंने ईरान के निकटवर्ती राज्यों पर विजय प्राप्त की और वहाँ अपना साम्राज्य स्थापित किया। ईसाईयों की धार्मिक पुस्तक 'बाईबल' मे भी असुर राजाओं का उल्लेख यहुदियों को क़ैद कर उन्हें दास बनाने के रूप में हुआ है। भारत में भी जाति प्रथा को आरम्भ करने वाले असुर थे। असुर लोग आर्य धर्म के विरोधी और निरंकुश व्यवस्था को अपनाने वाले थे। असुर का अर्थ असुर शब्द 'असु' अर्थात 'प्राण', और 'र' अर्थात 'वाला' (प्राणवान् अथवा शक्तिमान) से मिलकर बना है। बाद के समय में धीरे-धीरे असुर भौतिक शक्ति का प्रतीक हो गया। ऋग्वेद में 'असुर' वरुण तथा दूसरे देवों के विशेषण रूप में व्यवहृत हुआ है, जिसमें उनके रहस्यमय गुणों का पता लगाता है। किंतु परवर्ती युग में असुर का प्रयोग देवों (सुरों) के शत्रु रूप में प्रसिद्ध हो गया। असुर देवों के बड़े भ्राता हैं एवं दोनों प्रजापति के पुत्र हैं। देवताओं से संघर्ष असुरों ने लगातार देवों के साथ युद्ध किया और इनमें से कई युद्धों में वे प्राय: विजयी भी होते रहे। उनमें से कुछ ने तो सारे विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया, जब तक कि उनका संहार इन्द्र, विष्णु, शिव आदि देवों ने नहीं किया। देवों के शत्रु होने के कारण उन्हें ही असुरों ही दुष्ट दैत्य कहा गया है, किंतु सामान्य रूप से वे दुष्ट नहीं थे। उनके गुरु भृगु के पुत्र शुक्राचार्य थे, जो देवगुरु बृहस्पति के तुल्य ही ज्ञानी और राजनयिक थे। ग्रंथों में उल्लेख महाभारत एवं अन्य प्रचलित दूसरी कथाओं के वर्णन में असुरों के गुणों पर प्रकाश डाला गया है। साधारण विश्वास में वे मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों की कोटि में आते हैं। 'कथासरित्सागर' की आठवीं तरङ्ग में एक प्रेम पूर्ण कथा में किसी असुर का वर्णन नायक के साथ हुआ है। संस्कृत के धार्मिक ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव में कोई अंतर नहीं दिखाया गया है, किंतु प्रारम्भिक अवस्था में दैत्य एवं दानव असुर जाति के दो विभाग समझे गये थे। दैत्य 'दिति' के पुत्र एवं दानव 'दनु' के पुत्र थे। पुराणों में आये उल्लेखों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण के उदय से पूर्व कंस ने यादव गणतंत्र के प्रमुख अपने पिता और मथुरा के राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर निरंकुश एकतंत्र की स्थापना करके अपने को सम्राट घोषित किया था। उसने यादव व आभीरों को दबाने के लिए इस क्षेत्र में असुरों को भारी मात्रा में ससम्मान बसाया था, जो प्रजा का अनेक प्रकार से उत्पीड़न करते थे। श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ही आभीर युवकों को संगठित करके इनसे टक्कर ली थी। ब्रज के विभिन्न भागों में इन असुरों को जागीरें देकर कंस ने सम्मानित किया। मथुरा के समीप दहिता क्षेत्र में दंतवक्र की छावनी थी, पूतना खेंचरी में, अरिष्ठासुर अरोठ में तथा व्योमासुर[1] कामवन में बसे हुए थे। परंतु कंस वध के फलस्वरूप यह असुर समूह या तो मार दिया गया या फिर ये इस क्षेत्र से भाग गये।[2] अन्य पर्याय देवताओं के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में 'असुर' का अर्थ होगा- "जो सुर नहीं है"[3] अथवा "जिसके पास सुर नहीं है"। असुरों के अन्य पर्याय निम्नलिखित हैं- दैत्य दैतेय दनुज इन्द्रारि दानव शुक्रशिष्य दितिसुत पूर्वदेव सुरद्विट् देवरिपु देवारि रामायण में असुरों की उत्पत्ति अलग प्रकार से बतायी गयी है- सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा[4] इत्यभिविश्रुता:। अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्चासुरा: स्मृता:॥ कथा हिन्दुओं अधिकांश तीर्थ देवों के नाम पर हैं और उनकी पूजा-आराधना के लिए हैं। किन्तु प्रसिद्ध तीर्थ स्थान 'गया', जहाँ लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए जाते हैं, का नाम असुर 'गय' यानी 'गयासुर' के नाम पर है। सम्भवत: इस तीर्थ का मूल वैदिक काल में हो, जब असुर इतने बुरे नहीं थे। असुर गयासुर के विषय में एक कथा निम्न प्रकार है- प्राचीन काल में गय नामक असुर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या कर रहा था। जब भगवान विष्णु उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे वर देने के लिए आए, तब गयासुर ने केवल यही वर माँगा कि उसका शरीर सभी तीर्थों से अधिक पवित्र हो जाए। भगवान ने उसे यह वर प्रदान कर दिया। इस वरदान का बड़ा ही अप्रत्याशिक फल हुआ। असुर गय को देख कर ही लोग मुक्ति पा जाते थे। इस कारण देवताओं के लिए यज्ञ होने बन्द हो गए। यज्ञ के बिना देवताओं को हविष्य मिलना बन्द हो गया और उनकी शक्ति भी क्षीण होने लगे। वे घबरा कर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी असुर गय के पास गए और उन्होंने कहा- "यज्ञ के लिए कुछ पवित्र स्थल चाहिए और इसके लिए गय के शरीर जैसा पवित्र स्थल कहीं नहीं है।" गय के सिर पर एक विशालकाय शिला रखी गई और ब्रह्मा, शिव आदि देवता शिला पर बैठ कर यज्ञ करने लगे, किन्तु गय का शरीर अभी भी चलायमान था। अन्त में जब विष्णु भी शिला पर बैठ गये, तब गय स्थिर हो गया और उसने कहा कि जब तक यह धरती, ये पर्वत, सूर्य, चन्द्र और तारे हैं, तब तक ब्रह्मा, विष्णु और शिव इस शिला पर विराजेंगे। इस तीर्थ का नाम मेरे नाम पर ही 'गया' होगा। इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा। यह माना जाता है कि गया में जिसका श्राद्ध हो गया हो, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसीलिए गया में श्राद्ध और पिंडदान के बाद फिर श्राद्ध की आवश्यकता नहीं होती।[5] टीका टिप्पणी और संदर्भ ऊपर जायें ↑ संभवतः वृत्रासुर ऊपर जायें ↑ असुर संस्कृति (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 12 जनवरी, 2012। ऊपर जायें ↑ विरोध में नञ्- तत्पुरुष ऊपर जायें ↑ मादक तत्त्व का उपयोग करने के कारण देवता लोग सुर कहलाये, किंतु ऐसा न करने से दैतेय लोग असुर कहलाये। ऊपर जायें ↑ गुप्त, लक्ष्मी नारायण। सुर, असुर और गयासुर (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 12 जनवरी, 2013।

👉राक्षस राक्षस अत्यंत प्राचीन काल की एक शक्तिशाली जाति थी, जो अपनी क्रूरता तथा अत्याचारों के कारण कुख्यात थी। इन्हें देव, मनुष्य इत्यादि तीन गणों में से एक माना गया है। हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में भी कई राक्षसों की कथाएँ मिलती हैं। पौराणिक महाकाव्य महाभारत में पांडव भीम द्वारा बकासुर तथा हिडिम्ब आदि कई राक्षसों के वध का उल्लेख है। 



देवता

कोई भी परालौकिक शक्ति का पात्र, जो अमर और पराप्राकृतिक है और इसलिये पूजनीय है, उसे ही 'देवता' या 'देव' कहा जाता है। हिन्दू धर्म में देवताओं को या तो परमेश्वर (ब्रह्म) का लौकिक रूप या फिर उन्हें ईश्वर का सगुण रूप माना जाता है।

  • 'देव' शब्द में 'तल्' प्रत्यय लगाकर 'देवता' शब्द की व्युत्पत्ति होती है। अत: दोनों में अर्थ-साम्य है।
  • निरूक्तकार ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि- "जो कुछ देता है वही देवता है अर्थात देव स्वयं द्युतिमान हैं- शक्तिसंपन्न हैं- किंतु अपने गुण वे स्वयं अपने में समाहित किये रहते हैं; जबकि देवता अपनी शक्ति, द्युति आदि संपर्क में आये व्यक्तियों को भी प्रदान करते हैं।"
  • देवता देवों से अधिक विराट हैं, क्योंकि उनकी प्रवृत्ति अपनी शक्ति, द्युति, गुण आदि का वितरण करने की होती है।
  • जब कोई देव दूसरे को अपना सहभागी बना लेता है, वह देवता कहलाने लगता है।

हिन्दू - Krishnakosh

हिन्दू अथवा 'हिन्दु' शब्द का पर्याय है, हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाला। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह किसी विशेष मत-मतान्तर का मानने वाला हो। सामाजिक जीवन में हिन्दू की बाहरी पहचान सिर्फ़ इस बात से होती है कि वह जाति-व्यवस्था को मानता है।

भारतवर्ष में बसने वाली प्राचीन जातियों का सामूहिक नाम हिन्दू तथा उनके समष्टिवादी धर्म का भाव हिन्दुत्व है। जब मुसलमान आक्रमणकारी जातियों ने इस देश में अपना राज्य स्थापित किया और बसना प्रारम्भ किया, तब वे मुसलमानों से इतर लोगों को अपने से पृथक करने के लिए सामूहिक रूप से हिन्दू तथा उनके धर्म को हिन्दू मज़हब (धर्म) कहने लगे। यूरोपीयों और अंग्रेज़ों ने भी इस परम्परा को जारी रखा। उन्होंने भारतीय जनता को छिन्न-भिन्न रखने के लिए उसको दो भागों बाँटा- मुस्लिम तथा ग़ैर मुस्लिम अर्थात् 'हिन्दू'। इस प्रकार आधुनिक यात्रावर्णन, इतिहास, राजनीति, धर्म विवरण आदि में भारत की मुस्लिमेतर जनता का नाम 'हिन्दू' तथा उनके धर्म का नाम 'हिन्दू धर्म' प्रसिद्ध हो गया।

इसमें सन्देह नहीं कि 'हिन्दू' शब्द भारतीय इतिहास में अपेक्षाकृत बहुत अर्वाचीन और विदेशी है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में इसका प्रयोग नहीं मिलता। एक अत्यन्त परवर्ती तन्त्रग्रन्थ, 'मेरुतन्त्र' में इसका उल्लेख पाया जाता है। इसका सन्दर्भ निम्नांकित है-

पंचखाना सप्तमीरा नव साहा महाबला:।
हिन्दूधर्मप्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्तिन:।।
हीनं दूशयत्येव हिन्दुरित्युच्यते प्रिये।
पूर्वाम्नाये नवशतां षडशीति: प्रकीर्तिता:।।[1]


उपर्युक्त सन्दर्भ में 'हिन्दू' शब्द की जो व्युत्पत्ति दी गई है, वह है- 'हीनं दूषयति स हिन्दू' अर्थात् जो हीन (हीनता अथवा नीचता) को दूषित समझता (उसका त्याग करता) है, वह हिन्दू है। इसमें सन्देह नहीं कि यह यौगिक व्युत्पत्ति अर्वाचीन है, क्योंकि इसका प्रयोग विदेशी आक्रमणकारियों के सन्दर्भ में किया गया है।

देवी-देवता

हिन्दुओं में असंख्य देवी-देवताओं की पूजा-आराधना की जाती है। इनके निमित्त हिन्दू पुरुष और स्त्रियाँ विभिन्न व्रत आदि भी करते हैं। हिन्दू धर्म में मान्य कुछ प्रमुख देवी-देवताओं के नाम निम्नलिखित हैं-

देवी- उमा, काली, दुर्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, अन्नपूर्णा, स्वाहा, योगमाया, संतोषी, चामुंडा तथा ऋद्धि सिद्धि आदि।

देवताब्रह्माविष्णु, महेश, अग्निदेव, अश्विनीकुमार, इन्द्र, कामदेव, कार्तिकेय, गणेश, गरुड़, चंद्र, विश्वेदेव, आदित्यगण, बलराम, यमराज, सूर्य, शनि, हनुमान, वरुण, वायु, विष्णु तथा सोमदेव आदि।

अवतार- कल्कि, कूर्म, कृष्ण, बुद्ध, नृसिंह, परशुराम, मत्स्य, राम, वराह, वामन।


रामायण महर्षि वाल्मीकि रामायण लिखते हुए रामायण वाल्मीकि द्वारा लिखा गया संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य है। इसके 24,000 श्लोक हिन्दू स्मृति का वह अंग हैं जिसके माध्यम से रघुवंश के राजा राम की गाथा कही गयी। इसे वाल्मीकि रामायण / बाल्मीकि रामायण भी कहा जाता है। रामायण के काण्ड रामायण के सात अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं। बालकाण्ड अयोध्याकाण्ड अरण्यकाण्ड किष्किन्धाकाण्ड सुन्दरकाण्ड युद्धकाण्ड (लंकाकाण्ड) उत्तराकाण्ड इस प्रकार सात काण्डों में वाल्मीकि ने रामायण को निबद्ध किया है। उपर्युक्त काण्डों में कथित सर्गों की गणना करने पर सम्पूर्ण रामायण में 645 सर्ग मिलते हैं। सर्गानुसार श्लोकों की संख्या 23,440 आती है जो 24,000 से 560 श्लोक कम है।


महाभारत - Krishnakosh

महाभारत हिन्दुओं का प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो हिन्दू धर्म के उन धर्म-ग्रन्थों का समूह है, जिनकी मान्यता श्रुति से नीची श्रेणी की हैं और जो मानवों द्वारा उत्पन्न थे। कभी-कभी सिर्फ़ 'भारत' कहा जाने वाला यह काव्य-ग्रंथ भारत का अनुपम, धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ है। यह हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है। यह विश्व का सबसे लंबा साहित्यिक ग्रंथ है, हालाँकि इसे साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों में से एक माना जाता है, किन्तु आज भी यह प्रत्येक भारतीय के लिये एक अनुकरणीय स्रोत है।

हिन्दू इतिहास गाथा

यह कृति हिन्दुओं के इतिहास की एक गाथा है। पूरे 'महाभारत' में एक लाख श्लोक हैं। विद्वानों में महाभारत काल को लेकर विभिन्न मत हैं, फिर भी अधिकतर विद्वान महाभारत काल को 'लौहयुग' से जोड़ते हैं। अनुमान किया जाता है कि महाभारत में वर्णित 'कुरु वंश' 1200 से 800 ईसा पूर्व के दौरान शक्ति में रहा होगा। पौराणिक मान्यता को देखें तो पता लगता है कि अर्जुन के पोते परीक्षित और महापद्मनंद का काल 382 ईसा पूर्व ठहरता है।

महाकाव्य का लेखन

'महाभारत' में इस प्रकार का उल्लेख आया है कि वेदव्यास ने हिमालय की तलहटी की एक पवित्र गुफ़ा में तपस्या में संलग्न तथा ध्यान योग में स्थित होकर महाभारत की घटनाओं का आदि से अन्त तक स्मरण कर मन ही मन में महाभारत की रचना कर ली थी, परन्तु इसके पश्चात उनके सामने एक गंभीर समस्या आ खड़ी हुई कि इस महाकाव्य के ज्ञान को सामान्य जन साधारण तक कैसे पहुँचाया जाये, क्योंकि इसकी जटिलता और लम्बाई के कारण यह बहुत कठिन कार्य था कि कोई इसे बिना किसी त्रुटि के वैसा ही लिख दे, जैसा कि वे बोलते जाएँ। इसलिए ब्रह्मा के कहने पर व्यास भगवान गणेश के पास पहुँचे। गणेश लिखने को तैयार हो गये, किंतु उन्होंने एक शर्त रख दी कि कलम एक बार उठा लेने के बाद काव्य समाप्त होने तक वे बीच में रुकेंगे नहीं। व्यासजी जानते थे कि यह शर्त बहुत कठनाईयाँ उत्पन्न कर सकती हैं।

Blockquote-open.gif

महाभारत शांति पर्व अध्याय-82:
कृष्ण:-
हे देवर्षि! जैसे पुरुष अग्नि की इच्छा से अरणी काष्ठ मथता है; वैसे ही उन जाति-लोगों के कहे हुए कठोर वचन से मेरा हृदय सदा मथता तथा जलता हुआ रहता है ॥6॥
हे नारद! बड़े भाई बलराम सदा बल से, गद सुकुमारता से और प्रद्युम्न रूप से मतवाले हुए है; इससे इन सहायकों के होते हुए भी मैं असहाय हुआ हूँ। ॥7॥ आगे पढ़ें:-कृष्ण नारद संवाद

Blockquote-close.gif

अतः उन्होंने भी अपनी चतुरता से एक शर्त रखी कि कोई भी श्लोक लिखने से पहले गणेश को उसका अर्थ समझना होगा। गणेश ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस तरह व्यास बीच-बीच में कुछ कठिन श्लोकों को रच देते। जब गणेश उनके अर्थ पर विचार कर रहे होते, उतने समय में ही व्यासजी कुछ और नये श्लोक रच देते। इस प्रकार सम्पूर्ण महाभारत तीन वर्षों के अन्तराल में लिखी गयी।

महाभारत युद्ध

वेदव्यास ने सर्वप्रथम पुण्यकर्मा मानवों के उपाख्यानों सहित एक लाख श्लोकों का आद्य भारत ग्रंथ बनाया। तदन्तर उपाख्यानों को छोड़कर चौबीस हज़ार श्लोकों की 'भारतसंहिता' बनायी। तत्पश्चात व्यासजी ने साठ लाख श्लोकों की एक दूसरी संहिता बनायी, जिसके तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख पितृलोक में तथा चौदह लाख श्लोक गन्धर्वलोक में समादृत हुए। मनुष्यलोक में एक लाख श्लोकों का आद्य भारत प्रतिष्ठित हुआ। महाभारत ग्रंथ की रचना पूर्ण करने के बाद वेदव्यास ने सर्वप्रथम अपने पुत्र शुकदेव को इस ग्रंथ का अध्ययन कराया।

विभिन्न नाम

यह महाकाव्य 'जय', 'भारत' और 'महभारत' इन तीन नामों से प्रसिद्ध हैं। वास्तव में वेद व्यास जी ने सबसे पहले 1,00,000 श्लोकों के परिमाण के 'भारत' नामक ग्रंथ की रचना की थी, इसमें उन्होंने भारतवंशियों के चरित्रों के साथ-साथ अन्य कई महान ऋषियों, चन्द्रवंशी-सूर्यवंशी राजाओं के उपाख्यानों सहित कई अन्य धार्मिक उपाख्यान भी डाले। इसके बाद व्यास जी ने 24,000 श्लोकों का बिना किसी अन्य ऋषियों, चन्द्रवंशी-सूर्यवंशी राजाओं के उपाख्यानों का केवल भारतवंशियों को केन्द्रित करके 'भारत' काव्य बनाया। इन दोनों रचनाओं में धर्म की अधर्म पर विजय होने के कारण इन्हें 'जय' भी कहा जाने लगा। महाभारत में एक कथा आती है कि जब देवताओं ने तराजू के एक पासे में चारों वेदों को रखा और दूसरे पर 'भारत ग्रंथ' को रखा, तो 'भारत ग्रंथ' सभी वेदों की तुलना में सबसे अधिक भारी सिद्ध हुआ। अतः 'भारत' ग्रंथ की इस महत्ता को देखकर देवताओं और ऋषियों ने इसे 'महाभारत' नाम दिया और इस कथा के कारण मनुष्यों में भी यह काव्य महाभारत के नाम से सबसे अधिक प्रसिद्ध हुआ।

महाभारत की मूल अभिकल्पना में अठारह की संख्या का विशिष्ट योग है। कौरव और पाण्डव पक्षों के मध्य हुए युद्ध की अवधि अठारह दिन थी। दोनों पक्षों की सेनाओं का सम्मिलित संख्याबल भी अठ्ठारह अक्षौहिणी था। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी अठ्ठारह थे।[3] महाभारत की प्रबन्ध योजना में सम्पूर्ण ग्रन्थ को अठारह पर्वों में विभक्त किया गया है और महाभारत में 'भीष्म पर्व' के अन्तर्गत वर्णित 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भी अठारह अध्याय हैं।

सम्पूर्ण महाभारत अठारह पर्वों में विभक्त है। ‘पर्व’ का मूलार्थ है- "गाँठ या जोड़"।[4] पूर्व कथा को उत्तरवर्ती कथा से जोड़ने के कारण महाभारत के विभाजन का यह नामकरण यथार्थ है। इन पर्वों का नामकरण, उस कथानक के महत्त्वपूर्ण पात्र या घटना के आधार पर किया जाता है। मुख्य पर्वों में प्राय: अन्य भी कई पर्व हैं।[5] इन पर्वों का पुनर्विभाजन अध्यायों में किया गया है। पर्वों और अध्यायों का आकार असमान है। कई पर्व बहुत बड़े हैं और कई पर्व बहुत छोटे हैं। अध्यायों में भी श्लोकों की संख्या अनियत है। किन्हीं अध्यायों में पचास से भी कम श्लोक हैं और किन्हीं-किन्हीं में संख्या दो सौ से भी अधिक है। मुख्य अठारह पर्वों के नाम इस प्रकार हैं-


महाभारत शांति पर्व अध्याय-82:
कृष्ण:-
हे देवर्षि! जैसे पुरुष अग्नि की इच्छा से अरणी काष्ठ मथता है; वैसे ही उन जाति-लोगों के कहे हुए कठोर वचन से मेरा हृदय सदा मथता तथा जलता हुआ रहता है ॥6॥
हे नारद! बड़े भाई बलरामसदा बल से, गदसुकुमारता से और प्रद्युम्नरूप से मतवाले हुए है; इससे इन सहायकों के होते हुए भी मैं असहाय हुआ हूँ। ॥7॥ आगे पढ़ें:-कृष्ण नारद संवाद 


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऊपर जायें वेदव्यासजी श्लोकों का उच्चारण करते जाते थे, जिन्हें भगवान श्रीगणेश ने लिखा।
  2. ऊपर जायें पुत्र के पुत्र
  3. ऊपर जायें धृतराष्ट्रदुर्योधनदु:शासनकर्णशकुनिभीष्मद्रोणकृपाचार्यअश्वत्थामाकृतवर्माश्रीकृष्णयुधिष्ठिरभीमअर्जुननकुलसहदेवद्रौपदी और विदुर
  4. ऊपर जायें वी.एस. आप्टे: संस्कृत-हिन्दी-कोश, पृ. 595
  5. ऊपर जायें सम्पूर्ण महाभारत में ऐसे पर्वों की कुल संख्या 100 हैं।



समुद्र मंथन

समुद्र मंथन

समुद्र मंथन पुराणों में वर्णित एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है जिसमें देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्रका मंथन किया था।

  1. हलाहल (विष)
  2. कामधेनु
  3. उच्चै:श्रवा (अश्व)
  4. ऐरावत हाथी
  5. कौस्तुभ मणि
  6. कल्पद्रुम
  7. रंभा
  8. लक्ष्मी
  9. वारुणी (मदिरा)
  10. चन्द्रमा
  11. पारिजात वृक्ष
  12. पांचजन्य शंख
  13. धन्वन्तरि (वैद्य)
  14. अमृत

पुराण - Krishnakosh

पुराणों की रचना वैदिक काल के काफ़ी बाद की है,ये स्मृति विभाग में रखे जाते हैं। पुराणों में सृष्टि के आरम्भ से अन्त तक का विशद विवरण दिया गया है। पुराणों को मनुष्य के भूत, भविष्य, वर्तमान का दर्पण भी कहा जा सकता है। इस दर्पण में मनुष्य अपने प्रत्येक युग का चेहरा देख सकता है। इस दर्पण में अपने अतीत को देखकर वह अपना वर्तमान संवार सकता है और भविष्य को उज्ज्वल बना सकता है। अतीत में जो हुआ, वर्तमान में जो हो रहा है और भविष्य में जो होगा, यही कहते हैं पुराण। इनमें हिन्दू देवी-देवताओं का और पौराणिक मिथकों का बहुत अच्छा वर्णन है। इनकी भाषा सरल और कथा कहानी की तरह है। पुराणों को वेदों और पनिषदों जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है।

पुराण महिमा

पुराण शब्द ‘पुरा’ एवं ‘अण’ शब्दों की संधि से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ -‘पुराना’ अथवा ‘प्राचीन’ होता है। ‘पुरा’ शब्द का अर्थ है - अनागत एवं अतीत।
Puran-1.png
‘अण’ शब्द का अर्थ होता है -कहना या बतलाना अर्थात् जो पुरातन अथवा अतीत के तथ्यों, सिद्धांतों, शिक्षाओं, नीतियों, नियमों और घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करे। माना जाता है कि सृष्टि के रचनाकर्ता ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम जिस प्राचीनतम धर्मग्रंथ की रचना की, उसे पुराण के नाम से जाना जाता है। हिन्दू सनातन धर्म में, पुराण सृष्टि के प्रारम्भ से माने गये हैं, इसलिए इन्हें सृष्टि का प्राचीनतम ग्रंथ मान लिया जाता है किन्तु ये बहुत बाद की रचना है। सूर्य के प्रकाश की भाँति पुराण को ज्ञान का स्रोत माना जाता है। जैसे सूर्य अपनी किरणों से अंधकार हटाकर उजाला कर देता है, उसी प्रकार पुराण अपनी ज्ञानरूपी किरणों से मानव के मन का अंधकार दूर करके सत्य के प्रकाश का ज्ञान देते हैं। सनातनकाल से ही जगत पुराणों की शिक्षाओं और नीतियों पर ही आधारित है।

विषयवस्तु

प्राचीनकाल से पुराण देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों - सभी का मार्गदर्शन करते रहे हैं। पुराण मनुष्य को धर्म एवं नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देते हैं। पुराण मनुष्य के कर्मों का विश्लेषण कर उन्हें दुष्कर्म करने से रोकते हैं। पुराण वस्तुतः वेदों का विस्तार हैं। वेद बहुत ही जटिल तथा शुष्क भाषा - शैली में लिखे गए हैं। वेदव्यास जी ने पुराणों की रचना और पुनर्रचना की। कहा जाता है, "पूर्णात पुराण।" जिसका अर्थ है, जो वेदों का पूरक हो, अर्थात् पुराण।[1] वेदों की जटिल भाषा में कही गई बातों को पुराणों में सरल भाषा में समझाया गया हैं। पुराण-साहित्य में अवतारवाद को प्रतिष्ठित किया गया है। निर्गुण निराकार की सत्ता को मानते हुए सगुण साकार की उपासना करना इन ग्रंथों का विषय है। पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र में रखकर पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म और कर्म-अकर्म की कहानियाँ हैं। प्रेम, भक्ति, त्याग, सेवा, सहनशीलता ऐसे मानवीय गुण हैं, जिनके अभाव में उन्नत समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। पुराणों में देवी-देवताओं के अनेक स्वरूपों को लेकर एक विस्तृत विवरण मिलता है। पुराणकारों ने देवताओं की दुष्प्रवृत्तियों का व्यापक विवरण किया है लेकिन मूल उद्देश्य सद्भावना का विकास और सत्य की प्रतिष्ठा ही है।

पुराणों की संख्या

भगवान शिव की मूर्ति, ऋषिकेश
Lord Shiva Statue, Rishikesh
 नारद मुनी

विष्णु पुराणब्रह्मा पुराणशिव पुराण
विष्णु पुराणब्रह्म पुराणशिव पुराण
भागवत पुराणब्रह्माण्ड पुराणलिङ्ग पुराण
नारद पुराणब्रह्म वैवर्त पुराणस्कन्द पुराण
गरुड़ पुराणमार्कण्डेय पुराणअग्नि पुराण
पद्म पुराणभविष्य पुराणमत्स्य पुराण
वराह पुराणवामन पुराणकूर्म पुराण


सुखसागर के अनुसार पुराण श्लोकों की संख्या ब्रह्मपुराण दस हज़ार पद्मपुराण पचपन हज़ार विष्णुपुराण तेइस हज़ार शिवपुराण चौबीस हज़ार श्रीमद्भावतपुराण अठारह हज़ार नारदपुराण पच्चीस हज़ार मार्कण्डेयपुराण नौ हज़ार अग्निपुराण पन्द्रह हज़ार भविष्यपुराण चौदह हज़ार पाँच सौ ब्रह्मवैवर्तपुराण अठारह हज़ार लिंगपुराण ग्यारह हज़ार वाराहपुराण चौबीस हज़ार स्कन्धपुराण इक्यासी हज़ार एक सौ कूर्मपुराण सत्रह हज़ार मत्सयपुराण चौदह हज़ार गरुड़पुराण उन्नीस हज़ार ब्रह्माण्डपुराण बारह हज़ार मनपुराण दस हज़ार 


साभार krishnakosh.org

Comments

Popular posts from this blog

लहान मुलांसाठी श्रीकृष्णाच्या १४ सर्वोत्तम कथा